देश की खबरें | एजीआर बकाये के रूप में सार्वजनिक उपक्रमों से चार लाख करोड़ रुपए की डॉट की मांग अनुचित : न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने गेल जैसे गैर दूरसंचार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से चार लाख करोड़ रुपए के भुगतान की मांग पर दूरसंचार विभाग को फिर से विचार करने का आदेश दिया और कहा कि दूरसंचार कंपनियों के मामले में उसके अक्टूबर, 2019 के फैसले के आधार पर इस तरह की मांग करना पूरी तरह अनुचित है।
नयी दिल्ली, 11 जून उच्चतम न्यायालय ने गेल जैसे गैर दूरसंचार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से चार लाख करोड़ रुपए के भुगतान की मांग पर दूरसंचार विभाग को फिर से विचार करने का आदेश दिया और कहा कि दूरसंचार कंपनियों के मामले में उसके अक्टूबर, 2019 के फैसले के आधार पर इस तरह की मांग करना पूरी तरह अनुचित है।
शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया लि. सहित दूरसंचार कंपनियों से कहा कि वे न्यायालय के फैसले के बाद सरकार को देय राशि के भुगतान के लिये जरूरी समय के बारे में स्पष्टीकरण के साथ हलफनामे दाखिल करें।
न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सुनवाई करते हुये उस गारंटी के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा जो भुगतान की समय सीमा सुनिश्चित करने के लिये इन संचार कंपनियों से ली जा सकती है।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारा फैसला सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से मांग करने का आधार नहीं हो सकता। हम आपसे (दूरसंचार विभाग) से अनुरोध करते हैं कि इसे वापस लिया जाये अन्यथा हम सख्त कार्रवाई करेंगे।’’
पीठ ने सार्वजनिक उपक्रमों से की गयी इस मांग पर सवाल उठाये और कहा, ‘‘यह पूरी तरह से अनुचित है।’’
लाइसेंस शुल्क और स्पेक्ट्रम शुल्क जैसी सरकारी देनदारियों की गणना के लिये समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) पर शीर्ष अदालत के अक्टूबर, 2019 के फैसले के बाद दूरसंचार विभाग ने गैस प्रदाता गेल इंडिया लि, विद्युत पारेषण कंपनी पावरग्रिड, ऑयल इंडिया, दिल्ली मेट्रो और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों से पिछले बकाये के रूप में चार लाख करोड़ रुपए की मांग की थी।
सरकार के स्वामित्व वाले इन उपक्रमों ने दूरसंचार विभाग की इस मांग को चुनौती दी और कहा कि दूरसंचार उनका मुख्य कारोबार नहीं है और लाइसेंस से आमदनी उनकी आय का बहुत ही मामूली हिस्सा है ।
दूरसंचार विभाग की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह एक हलफनामा दायर कर स्पष्ट करेंगे कि सार्वजनिक उपक्रमों से समायोजित सकल राजस्व के आधार पर बकाया राशि के भुगतान की मांग क्यों की गयी है।
इन निजी दूरसंचार कंपनियों को समायोजित सकल राजस्व की बकाया राशि के रूप में शेष 93 हजार 520 करोड़ रुपए के भुगतान के लिये 20 साल का समय देने के सरकार के अनुरोध पर न्यायालय ने इतनी लंबी अवधि की वजह जानना चाही और यह भी जानना चाहा कि ये कंपनियां और उनके निदेशक किस तरह की गारंटी दे सकते हैं।
न्यायालय इस मामले में अब 18 जून को आगे सुनवाई करेगा।
शीर्ष अदालत द्वारा 24 अक्टूबर, 2019 के फैसले पर पुनर्विचार के लिये वोडाफोन आइडिया, भारती एयरटेल और टाटा टेलीसर्विसेज की याचिकायें खारिज किये जाने के बाद दूरसंचार विभाग ने बकाया राशि के भुगतान की अवधि 20 साल करने के लिये न्यायालय में मार्च में आवेदन किया था।
इस आवेदन में यह अनुरोध भी किया गया था कि न्यायालय के फैसले की तारीख के बाद इन कंपनियों से जुर्माना और जुर्माने तथा मूलधन पर ब्याज नहीं लिया जाये।
इस मामले की सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि सरकार ने एजीआर की बकाया राशि के मुद्दे पर गहनता से विचार किया है और पाया कि इन दूरसंचार कंपनियों के लिये एक ही बार में बकाया राशि का भुगतान करना मुश्किल होगा।
पीठ ने दूरसंचार विभाग से जानना चाहा कि कितनी अवधि के भीतर ये संचार कंपनियां एजीआर की बकाया राशि का भुगतान करेंगी।
मेहता ने पीठ से कहा कि दूरंसचार कंपनियों को बकाया राशि के भुगतान के मामले में न्यायालय को लिखित में आश्वासन देना चाहिए।
पीठ ने साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से की गयी मांग पर भी सवाल उठाये और कहा कि न्यायालय के फैसले में इस मुद्दे पर विचार नहीं किया गया था।
मेहता ने जब यह कहा कि इन उपक्रमों के पास स्पेक्ट्रम है तो पीठ ने कहा कि इससे पहले उनसे इस तरह की कोई मांग क्यों नहीं की गयी थी और अब न्यायालय के फैसले के बाद ऐसा क्यों किया गया।
मेहता ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को अलग वर्ग में रखने की आवश्यकता है क्योंकि वे खुद में ही एक वर्ग हैं और सरकारी कार्यों का निर्वहन करते हैं। वे दूसरी संचार कंपनियों की तरह वाणिज्यिक कार्यों के लिये मोबाइल सेवायें नहीं देते हैं।
पीठ ने कहा कि दूरसंचार विभाग ने उसके फैसले की गलत व्याख्या की है। पीठ ने मेहता से जानना चाहा कि इन उपक्रमों से चार लाख करोड़ रुपए की पूरी तरह अनुचित मांग क्यों की गयी।
पीठ ने कहा, ‘‘हम चाहते हैं कि वे हलफनामा देकर बतायें कि ऐसा कैसे हो सकता है? हम उन्हें दंडित करेंगे।’’
मेहता ने पीठ से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि एजीआर मामले में उसका फैसला सार्वजनिक उपक्रमों पर लागू नहीं होगा।
पीठ ने सुनवाई 18 जून के लिये स्थगित करते हुये दूरसंचार कंपनियों को भी बकाया राशि के भुगतान के बारे में हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया।
इस मामले की सुनवाई के अंतिम क्षणों में पीठ ने दूरसंचार कंपनियों से जानना चाहा कि क्या उन्होंने कोविड-19 महामारी से निबटने के लिये राहत कोष में योगदान किया है।
इस पर निजी संचार कंपनियों के वकीलों ने पीठ को सूचित किया कि उन्होंने पीएम केयर्स फंड सहित कोविड-19 राहत में योगदान किया है।
इस मद में बकाया राशि में से भारती एयरटेल ने 43,980 करोड़ रुपए में से 18,004 करोड़ रुपए, वोडाफोन आइडिया ने 51,400 करोड़ रुपए में से सिर्फ 6,854 करोड़ रुपए और टाटा समूह ने 16,798 करोड़ रुपए में से 4,197 करोड़ रुपए का भुगतान किया है।
अनूप
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)