नयी दिल्ली, 19 जून उत्तर प्रदेश में एक गांव पर कोरोना वायरस लॉकडाउन के प्रभाव पर रिपोर्ट को लेकर एक पत्रकार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किये जाने की मीडिया संगठनों ने आलोचना की और कहा कि कई सरकारें राज्य प्रशासन को ‘विरोध की आवाज दबाने’ के लिये इस्तेमाल कर रहीं हैं ।
गौरतलब है कि समाचार पोर्टल ‘स्क्रोल’ की संपादक सुप्रिया शर्मा के खिलाफ वाराणसी के रामनगर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गयी है। पुलिस सूत्रों ने बताया कि यह प्राथमिकी वाराणसी के डोमरी गांव निवासी माला देवी द्वारा दी गई एक शिकायत के आधार पर दर्ज की गयी है।
डोमरी गांव को प्रधानमंत्री द्वारा आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया गया है।
एडीटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने शर्मा के खिलाफ प्राथमिकी को अतिरंजित प्रतिक्रिया बताया । एक बयान में गिल्ड ने कहा कि पत्रकारों के खिलाफ कानून के आपराधिक प्रावधानों का प्रयोग अब अस्वस्थ और गंदा चलन हो गया है जिसकी लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है ।
इसने कहा कि इसका विरोध होना चाहिये और इसे खत्म किया जाना चाहिये ।
गिल्ड ने स्क्रोल डाट इन के बयान का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि वह अब भी उस लेख पर कायम है । स्क्रोल ने कहा कि डोमरी गांव में माला देवी का इंटरव्यू पांच जून 2020 को किया गया था और उनके बयान आलेख ‘ प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गोद लिये गए वाराणसी के गांव में लॉकडाउन में लोग भूखे हैं ’ में सटीक रूप से रिपोर्ट किये गए ।
भारतीय महिला प्रेस कोर ने भी शर्मा के खिलाफ प्राथमिकी पर चिंता जताई है । इसने एक बयान में कहा कि प्राथमिकी पत्रकारों को धमकाने का एक और प्रयास है ताकि वे सत्तारूढ लोगों को असहज लगने वाले समाचारों पर फोकस नहीं कर सकें ।
इसने कहा कि सत्ता को सच दिखाना पत्रकारों का काम है ताकि सरकार सुधार के उपाय करके गलत चीजों को खत्म कर सके । बयान में कहा गया ,‘‘इसकी बजाय कई सरकारें राज्य प्रशासन का प्रयोग विरोध के स्वर उठाने वालों को धमकाने और उनके उत्पीड़न के लिये कर रहीं हैं ।’’
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