देश की खबरें | फारूक, उमर ने हिरासत में रखे गए नेकां के 16 नेताओं की रिहाई के लिए अदालत का रुख किया : पार्टी

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श्रीनगर, 13 जुलाई नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) ने पिछले साल पांच अगस्त से अपने घरों में नजरबंद किए गए पार्टी के 16 वरिष्ठ नेताओं की जल्द रिहाई का अनुरोध करते हुए सोमवार को जम्मू एवं कश्मीर उच्च न्यायालय का रूख किया।

पार्टी के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने पार्टी के इन नेताओं की रिहाई के अनुरोध को लेकर कई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की। उन्होंने दलील दी कि उन्हें स्वतंत्रता का अधिकार संबंधी संवैधानिक गारंटी का ‘‘उल्लंघन’’ कर नजरबंद किया गया है।

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केंद्र ने पिछले साल पांच अगस्त को ही पूर्ववर्ती राज्य का विशेष दर्जा वापस लेने की घोषणा की थी।

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल रिट याचिकाओं के अनुसार नेकां के महासचिव अली मोहम्मद सागर, प्रांतीय अध्यक्ष नासिर असलम वानी, वरिष्ठ नेता आगा सैयद महमूद, पार्टी के मुख्य प्रवक्ता आगा सैयद आर मेहदी और अन्य को ‘‘अवैध रूप’’ से उनके आवासों पर नजरबंद रखा गया है।

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इन नेताओं को पिछले 11 महीने से उनके घरों में नजरबंद रखा गया है।

जिन अन्य नेताओं की रिहाई के लिए याचिकाएं दायर की गई है उनमें अब्दुल रहीम राठेर, मोहम्मद खलील बंध, इरफान शाह, साहमीमा फिरदौस, मोहम्मद शफी उरी, चौधरी मोहम्मद रमजान, मुबारक गुल, डॉ बशीर वीरी, अब्दुल मजीद लारमी, बशारत बुखारी, सैफुद्दीन बट्ट और मोहम्मद शफी शामिल हैं।

फारूक अब्दुल्ला ने सात नेताओं के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की जबकि उनके बेटे उमर अब्दुल्ला ने शेष नौ नेताओं के लिए इसी तरह की एक याचिका दायर की।

वरिष्ठ वकील शरीक रियाज ने दोनों नेताओं की ओर से उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के समक्ष याचिकाएं दायर की हैं।

पार्टी ने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा कि वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को ‘‘असंवैधानिक और अवैध रूप से घर पर नजरबंद रखे जाने’’ को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की गई है।

पार्टी प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि सख्त जन सुरक्षा कानून के तहत हिरासत से रिहा किए जाने के बाद पार्टी सदस्यों को लगातार नजरबंद रखा गया है। उन सदस्यों को राहत मुहैया कराने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटने का निर्णय लिया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘किसी भी प्रशासनिक आदेश के बिना नजरबंदी गैरकानूनी है और यह मानव अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कमतर करती है।’’

प्रवक्ता ने उम्मीद जताई कि अदालत से उनके सहयोगियों को राहत मिलेगी जो बिना किसी गलती के भी पांच अगस्त, 2019 को संविधान के अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35 ए के प्रावधानों को निरस्त करने के बाद से परेशानी झेल रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘यह हमारे लिए एकमात्र रास्ता बचा था। हमें उम्मीद है कि अदालत हमारे सहयोगियों की नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखेगी, जिनमें से अधिकतर की तबियत ठीक नहीं है।’’

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