देश की खबरें | पीठासीन जज की राय पर अत्यधिक जोर देने से दोषी की सजा माफ करने का सरकार का फैसला टिकाऊ नहीं रह जाएगा : न्यायालय

नयी दिल्ली, 26 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि पीठासीन न्यायाधीश की राय पर ‘अत्यधिक जोर’ नहीं दिया जा सकता और अन्य प्राधिकारियों की टिप्पणियों की पूरी तरह से अनदेखी भी नहीं की जा सकती, क्योंकि इससे किसी दोषी की सजा में छूट की अर्जी पर सरकार का फैसला टिकाऊ नहीं रह जायेगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार के सजा माफी बोर्ड को किसी दोषी की समय-पूर्व रिहाई की अर्जी पर विचार करते समय पूरी तरह से पीठासीन न्यायाधीश की राय या पुलिस द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432(1) उपयुक्त सरकार को किसी दोषी की सजा निलंबित करने या उसमें छूट देने का अधिकार देती है।

सीआरपीसी की धारा 432(2) उस प्रक्रिया को निर्धारित करती है, जिसके तहत सरकार उस अदालत के पीठासीन न्यायाधीश की राय ले सकती है, जिसके समक्ष या जिसके द्वारा याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया गया था। सरकार संबंधित न्यायाधीश से तार्किक आधार पर यह सलाह ले सकती है कि सजा में छूट या निलंबन की अर्जी स्वीकार की जा सकती है या यह खारिज कर दी जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट्ट और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने बिहार निवासी राजो उर्फ ​​राजेंद्र मंडल की याचिका पर शुक्रवार को अपना फैसला सुनाया, जिसे दो पुलिसकर्मियों सहित तीन लोगों की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

पीठ ने कहा कि हत्या और शस्त्र अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया मंडल 24 साल से बिना किसी सजा में छूट या पैरोल के जेल में बंद है और उसकी सजा में छूट संबंधी अर्जी को पीठासीन न्यायाधीश एवं पुलिस अधीक्षक की प्रतिकूल रिपोर्ट के कारण संबंधित बोर्ड ने दो बार खारिज कर दिया था।

पीठासीन न्यायाधीश ने दो बार और एसपी ने एक बार मंडल की रिहाई के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट दी थी।

पीठ ने राज्य के सजा में छूट बोर्ड को तीन महीने के भीतर मंडल के मामले पर पुनर्विचार करने को कहा और संबंधित पीठासीन न्यायाधीश को इस फैसले की तारीख से एक महीने के भीतर मंडल की अर्जी पर राय देने को कहा।

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