देश की खबरें | नियोक्ता को वैध आधार पर चयनित सूची से नियुक्ति करने से इंकार करने का अधिकार है: न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि नियोक्ता को वैध आधार पर चयनित सूची में शामिल किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति करने से इंकार करने का अधिकार है और राज्य की न्यायिक सेवा में पदासीन व्यक्ति से असंदिग्ध चरित्र और आचरण की अपेक्षा की जाती है।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि नियोक्ता को वैध आधार पर चयनित सूची में शामिल किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति करने से इंकार करने का अधिकार है और राज्य की न्यायिक सेवा में पदासीन व्यक्ति से असंदिग्ध चरित्र और आचरण की अपेक्षा की जाती है।

शीर्ष अदालत ने मप्र उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज करते हुये यह टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने इस व्यक्ति को जिला न्यायाधीश (प्रवेश स्तर) के पद पर नियुक्त के अनुपयुक्त पाया था।

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न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘चयनित सूची में नाम शामिल होना मात्र ही किसी प्रत्याशी को अधिकार प्रदान नहीं करता है। नियोक्ता को चयनित सूची में शामिल व्यक्ति को किसी वैध आधार पर नियुक्ति करने से इंकार करने का अधिकार है। राज्य की न्यायिक सेवा में पदासीन व्यक्ति से असंदिग्ध चरित्र और आचरण की अपेक्षा की जाती है।’’

मप्र उच्च न्यायालय ने पात्रता रखने वाले अधिवक्ताओं से उच्च न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीश (प्रवेश स्तर) पर सीधी भर्ती के लिये मार्च, 2017 में आवेदन आमंत्रित किये थे।

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याचिकाकर्ता ने इस विज्ञापन के आधार पर ऑनलाइन आवेदन किया। परीक्षा में सफल घोषित किये जाने के बाद उसे साक्षात्कार के लिये बुलाया गया था।

इस व्यक्ति का नाम तदर्थ और प्रतीक्षा सूची में शामिल किया गया था और उसने इस बारे में विधि एवं विधायी विभाग से अप्रैल, 2018 में संदेश भी प्राप्त किया था कि इस पद के लिये उसका चयन हो गया है।

बाद में जुलाई, 2018 में उसे सूचित किया गया कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला है और करीब दो महीने बाद विधि एवं विधायी विभाग ने उसे अयोग्य घोषित करते हुये चयनित व्यक्तियो की सूची से उसका नाम हटा दिया था।

बाद में मुख्य चयन सूची से उसका नाम हटाने के बारे में राजपत्र में अधिसूचना भी प्रकाशित हुयी थी।

इसके बाद, इस व्यक्ति ने उच्च न्यायालय में इस आदेश और राजपत्र की अधिसूचना को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय में सफलता नहीं मिलने पर उसने शीर्ष अदालत में अपील दायर की थी।

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