देश की खबरें | जम्मू कश्मीर में सैनिकों की हिफाजत और तनाव कम करते हैं कुत्ते

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कश्मीर में तैनात 44वीं राष्ट्रीय राइफल के जवानों के लिए कुत्ते सबसे अच्छे दोस्तों में से हैं क्योंकि वे खतरे और तनाव दोनों को दूर रखने का काम करते हैं।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

शोपियां, चार अक्टूबर कश्मीर में तैनात 44वीं राष्ट्रीय राइफल के जवानों के लिए कुत्ते सबसे अच्छे दोस्तों में से हैं क्योंकि वे खतरे और तनाव दोनों को दूर रखने का काम करते हैं।

दिन भर गश्त लगाने के बाद जवान जब लौटते हैं तब लैब्राडोर प्रजाति के रॉश के साथ खेलकर उन्हें ऊर्जा मिलती है।

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राष्ट्रीय राइफल (आरआर) के जवानों के साथ रॉश समेत छह कुत्ते देश को सुरक्षित रखने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं।

बल की इकाई के साथ रॉश, तापी और क्लायड नामक कुत्ते दक्षिण कश्मीर के संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी रखते हैं जिनमें पुलवामा का लासीपुरा, इमाम साहब और शोपियां शामिल हैं।

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जवानों के साथ मिलकर ये कुत्ते, आईईडी विस्फोटकों का पता लगाने, हिंसक भीड़ का पीछा करने और फरार आतंकवादियों का पता लगाने जैसे काम को बखूबी अंजाम देते हैं।

44वीं आरआर के प्रमुख कर्नल ए के सिंह के अनुसार कुत्तों के दल ने आतंकवाद रोधी कई अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कई ऐसी घटनाओं को टालने में सफलता पाई है जिनमें सुरक्षा बलों के जवानों के लिए जान का खतरा हो सकता था।

कर्नल सिंह ने कहा कि रॉश बल के लिए एक “सेलिब्रिटी” की तरह है क्योंकि उसने पिछले साल हिजबुल मुजाहिदीन के एक वांछित आतंकवादी को पकड़ने में सहायता की थी।

उन्होंने कहा कि आतंकवादी मुठभेड़ के स्थान से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर छुपा था जिसे रॉश ने पकड़वाया था।

घटना को याद करते हुए कर्नल सिंह ने कहा कि शोपियां में रात को द्रगड़ गांव में मुठभेड़ हुई थी और सुरक्षा बलों को न तो आतंकवादियों की संख्या ज्ञात थी न उनकी सटीक स्थिति की जानकारी थी।

कर्नल सिंह ने कहा, “सुबह एक खोजी दस्ते ने दो आतंकवादियों की पहचान की और खून के निशान देखे। हमने तत्काल रॉश को काम पर लगाया और खोज शुरू की। उसने गंध पकड़ ली थी। ऊंचे-नीचे रास्तों और घने बगीचों से होते हुए रॉश आतंकवादी का पीछा करता रहा जबकि खून के निशान लगभग अदृश्य हो चुके थे। अचानक वह लकड़ियों के एक गठ्ठर पर कूदा जहां तीसरा आतंकवादी छुपा था।”

उन्होंने कहा कि अभियान समाप्त होने के बाद तीसरे आतंकवादी की पहचान आबिद मंजूर मगरे उर्फ सुज्जु मगरे के रूप में की गई जो हिजबुल मुजाहिदीन आतंकी संगठन का कमांडर था और कई मामलों में वांछित था।

इस साल सेना दिवस के अवसर पर रॉश को सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख द्वारा प्रशस्ति पत्र दिया गया था।

आरआर के जवानों के श्वान सहयोगी, उस समय सैनिकों की पहरेदारी करते हैं जब वे सो रहे होते हैं।

ये कुत्ते, जवानों को बारूदी सुंरगों से भी बचाते हैं।

सेना के अधिकारी भी इन कुत्तों का पूरा ख्याल रखते हैं।

वर्तमान में ‘डिफेन्स इंटेलिजेंस एजेंसी’ के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल के जे एस ढिल्लों की वह तस्वीर खासी चर्चा में रही थी जिसमें वह “मेनका” नामक कुतिया को सलामी दे रहे थे।

अमरनाथ यात्रा के दौरान मेनका ने रास्ते को सूंघ कर संभावित विस्फोटकों के खतरे को निर्मूल किया था।

कई आतंक रोधी अभियानों के लिए इन कुत्तों को बहादुरी के पुरस्कार मिल चुके हैं।

सेना की इकाई में शामिल मानसी नामक चार साल की लैब्राडोर को मरणोपरांत ‘मेंशन इन डिस्पैच’ का प्रमाण पत्र दिया गया था।

मरणोपरांत युद्ध पुरस्कार पाने वाली वह पहली श्वान थी।

राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की खातिर मानसी का नाम भारत के राजपत्र में उल्लिखित है।

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