नयी दिल्ली, दो दिसंबर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने कहा है कि दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) ने तीसरे चरण की सभी नई लाइन पर बिना तैयारी और लागत एवं लाभ का विश्लेषण किए बगैर ही चालक-रहित ट्रेनों के परिचालन की तकनीक अपना ली।
सीएजी ने बृहस्पतिवार को संसद के पटल पर रखी गई इस रिपोर्ट में कहा है कि डीएमआरसी ने त्रिलोकपुरी खंड के निर्माण से प्रभावित हो रहे लोगों के पुनर्वास की जगह भी बार-बार बदली।
दिल्ली मेट्रो के तीसरे चरण के क्रियान्वयन पर जारी इस रिपोर्ट में सीएजी ने कहा है कि भारत सरकार ने शुरू में तीसरे चरण के लिए चार गलियारे को अनुमति दी थी जिसके लिए 35,242 करोड़ रुपये की संस्तुति भी की गई। लेकिन इस चरण का विस्तार कर 103.5 किलोमीटर से बढ़ाकर 160.76 किलोमीटर कर दिया गया और लागत भी बढ़कर 48,565.12 करोड़ रुपये हो गई।
वर्ष 2011-19 के दौरान इस चरण के तहत डीएमआरसी ने 107.27 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड ट्रैक और 53.48 किलोमीटर लंबे भूमिगत ट्रैक का निर्माण किया।
सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि डीएमआरसी ने इस चरण में बनी सभी नई लाइन पर चालक-रहित ट्रेनों के परिचालन का फैसला ले लिया जबकि इसके पहले उसने न तो कोई तैयारी की और न ही लागत एवं लाभ का विश्लेषण ही किया।
इस चरण में बनी मेजेंटा लाइन पर पहली बार बिना ड्राइवर के मेट्रो ट्रेन का परिचालन पिछले साल 28 दिसंबर को शुरू हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाइन-8 पर संचालित इस सेवा की शुरुआत की थी।
इसी तरह 59 किलोमीटर लंबी पिंक लाइन पर चालक-रहित मेट्रो ट्रेन परिचालन इस साल 25 नवंबर को ही शुरू हुआ है।
सीएजी के मुताबिक, डीएमआरसी के निदेशक मंडल ने तीसरे चरण में बनने वाली मेट्रो लाइन पर नौ कोच चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी लेकिन कुछ समय बाद ही इसे बदलकर छह कोच कर दिया गया।
सीएजी ने कहा, "डीएमआरसी का यह फैसला लागत-लाभ का विश्लेषण के बगैर किया गया था। इससे भविष्य में कोच की संख्या बढ़ाने की गुंजाइश भी खत्म हो गई।"
इसके साथ ही सीएजी ने कहा है कि डीएमआरसी ने तीसरे चरण की परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी भी नहीं ली थी।
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