नयी दिल्ली, एक मई उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि जीवनसाथियों के बीच आई दरार भर नहीं पाने के आधार पर तलाक की मंजूरी देना ‘अधिकार’ का नहीं, बल्कि विशेषाधिकार का मामला है, जिसका विभिन्न तथ्यों को ध्यान में रखकर काफी सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ताकि दोनों पक्षों के साथ ‘पूर्ण न्याय’ हो।
न्यायमूर्ति एस के कौल की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि ऐसे मामलों में शीर्ष अदालत को पूरी तरह से आश्वस्त और संतुष्ट होना चाहिए कि विवाह ‘‘पूरी तरह से अव्यावहारिक, भावनात्मक रूप से मृत और बचाने लायक नहीं’’ है, इसलिए विवाह को समाप्त करना ही सही समाधान है और आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता।
पीठ ने कहा कि वैवाहिक बंधन ऐसे मोड़ पर पहुंच गया हो, जिसे बचाया नहीं जा सकता, तो इसे तथ्यात्मक रूप से निर्धारित और दृढ़ता से स्थापित करना होता है और इसके लिए कई कारकों पर विचार किया जाना जरूरी है, यथा- दंपति के बीच सहवास की समय अवधि, जब दंपति ने अंतिम बार सहवास किया था, दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ लगाए गए आरोप की प्रकृति।
संविधान पीठ ने कहा कि जिन अन्य कारकों पर विचार किया जाता है, उनमें समय-समय पर कानूनी कार्यवाही में पारित आदेश, व्यक्तिगत संबंधों पर संचयी प्रभाव, अदालत के हस्तक्षेप या मध्यस्थता के माध्यम से विवादों को निपटाने के लिए क्या और कितने प्रयास किए गए, और अंतिम प्रयास कब किया गया, जैसे तथ्य शामिल हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘अलग रहने की अवधि पर्याप्त रूप से लंबी होनी चाहिए, और छह साल या उससे अधिक का समय एक प्रासंगिक कारक होगा।’’
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘लेकिन इन तथ्यों का मूल्यांकन दोनों पक्षों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए, जिसमें उनकी शैक्षिक योग्यता, दोनों पक्षों से उत्पन्न बच्चे, उनकी उम्र, बच्चों की शैक्षणिक योग्यता आदि तथ्य शामिल हैं।’’
संविधान पीठ में न्यायमूर्ति कौल के अलावा न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति ए एस ओका, न्यायमूर्त विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी शामिल थे।
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