नयी दिल्ली, सात सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कम कीमत पर अनाज पाने वालों की श्रेणी में यदि मोची, फेरीवालों और घरेलू सहायकों को रखा जा सकता है तो इस श्रेणी में दिव्यांगों को क्यों नहीं रखा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की एक पीठ ने केंद्र से पूछा, “दिव्यांग श्रेणी को क्यों नहीं शामिल किया गया? जब आप मोची, फेरीवालों और घरेलू सहायकों को शामिल कर रहे हैं तो दिव्यांगों को क्यों नहीं जिनके लिए संसद द्वारा अलग से एक कानून बनाया गया है। यह केवल उनकी सहायता के लिए है। आप एक श्रेणी को जोड़ रहे हैं तो इस श्रेणी को क्यों भूल गए।”
पीठ ने कहा कि यदि सरकार यह नहीं कर सकती तो “हम आदेश देंगे।”
केंद्र सरकार द्वारा हलफनामे का जवाब दिया गया था जिसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और संबंधित योजनाओं के तहत कम कीमत पर अनाज पाने वाले लोगों की श्रेणी उल्लिखित थी।
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सरकार के जवाब का संज्ञान लेते हुए अदालत ने यह टिप्पणी की।
एक गैर सरकारी संगठन की ओर से दायर जनहित याचिका के जवाब में हलफनामा दायर किया गया था।
जनहित याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की गई थी कि कोविड-19 महामारी के इस दौर में विभिन्न खाद्य सुरक्षा तथा गरीबी उन्मूलन योजनाओं का लाभ दिव्यांगों को भी दिया जाए।
वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि प्रत्येक समाज या सभ्यता में महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों, कैदियों और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती है।
पीठ ने सरकार से कहा कि एक परिपत्र के द्वारा स्पष्ट किया जाए कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और अन्य योजनाओं के तहत कम कीमत पर अनाज पाने वाले लोगों की श्रेणी में दिव्यांग भी हैं।
अदालत द्वारा उठाए गए बिंदुओं का जवाब देने के लिए अतिरिक्त महाधिवक्ता चेतन शर्मा ने और समय मांगा।
उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख 29 सितंबर निर्धारित की है।
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