देश की खबरें | दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि को डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ ‘अपमानजनक’ विज्ञापन प्रसारित करने से रोका
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि को डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक विज्ञापन प्रसारित करने से बृहस्पतिवार को रोक दिया और कहा कि यह प्रथम दृष्टया टीवी और प्रिंट विज्ञापनों के जरिये अपमान का एक स्पष्ट और ठोस मामला है।
नयी दिल्ली, तीन जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने पतंजलि को डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक विज्ञापन प्रसारित करने से बृहस्पतिवार को रोक दिया और कहा कि यह प्रथम दृष्टया टीवी और प्रिंट विज्ञापनों के जरिये अपमान का एक स्पष्ट और ठोस मामला है।
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने पतंजलि को विज्ञापन प्रसारित करने से रोकने का अनुरोध करने वाली डाबर की अंतरिम याचिका स्वीकार कर ली और पतंजलि को निर्देश दिया कि वह प्रिंट विज्ञापनों से '40 जड़ी-बूटियों से बने साधारण च्यवनप्राश से क्यों संतुष्ट हों?' वाली पंक्ति हटाकर विज्ञापन को संशोधित करे।
न्यायाधीश ने कहा, “इसी तरह, जहां तक टीवी विज्ञापनों (टीवीसी) का संबंध है, प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे विवादित टीवीसी से 'जिनको आयुर्वेद या वेदों का ज्ञान नहीं है, चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि और च्यवनऋषि की परंपरा के अनुरूप, मूल च्यवनप्राश कैसे बना पाएंगे” पंक्ति हटाएं। इसी तरह, प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि टीवीसी के अंत में दी गई, 'तो साधारण च्यवनप्राश क्यों’ वाली पंक्ति भी हटाएं।”
पीठ ने कहा कि संशोधनों के बाद पतंजलि को प्रिंट और टीवी विज्ञापन चलाने की अनुमति दी जाएगी।
न्यायाधीश ने कहा कि टीवी विज्ञापन का वर्णन रामदेव ने किया है, जो एक जाने-माने योग और वैदिक विशेषज्ञ हैं और विज्ञापन में स्वयं भी दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के विशेषज्ञ के रूप में लोकप्रिय व्यक्ति द्वारा विज्ञापन का वर्णन किए जाने के कारण यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
पीठ ने कहा, “टीवीसी में दिया गया यह बयान झूठा होने के साथ-साथ भ्रामक भी है, क्योंकि रामदेव को ब्रांड एंबेसडर बनाकर प्रतिवादियों ने यह धारणा बनाई है कि केवल प्रतिवादियों को ही आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान है और वे परंपराओं के अनुसार असली च्यवनप्राश बना सकते हैं। जबकि, तथ्य यह है कि च्यवनप्राश ऊपर उल्लेखित औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 3(ए) के तहत परिभाषित एक आयुर्वेदिक औषधि है। च्यवनप्राश बनाने के लिए निर्माता के लिए आयुर्वेद और वेदों का 'ज्ञान' होना कोई अनिवार्य नहीं है। निर्माता निर्धारित नुस्खों/सूत्रों से च्यवनप्राश बना सकता है।”
न्यायाधीश ने कहा कि पतंजलि के लिए यह कहना उचित है कि 'पतंजलि स्पेशल च्यवनप्राश' सर्वोत्तम है, लेकिन उनके लिए यह कहना उचित नहीं है कि च्यवनप्राश के अन्य निर्माताओं के पास आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार इसे तैयार करने के लिए आवश्यक ज्ञान और तकनीकी जानकारी का अभाव है, क्योंकि यह बात सबसे पहले तो असत्य है और दूसरी बात, यह आम लोगों को गुमराह करने वाली बात है।
न्यायाधीश ने कहा, “विज्ञापनों के माध्यम से यह संदेश देना गलत है कि केवल पतंजलि ही महान ऋषियों द्वारा स्थापित परंपरा का पालन करता है। इससे सामान्य रूप से सभी च्यवनप्राश निर्माताओं का अपमान होता है। प्रतिवादी सूचीबद्ध आयुर्वेदिक शास्त्रों के अनुसार च्यवनप्राश बना रहे वादी या अन्य निर्माताओं को खराब नहीं कह सकते।”
न्यायाधीश ने कहा कि इसके अलावा, जब तक डाबर या औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम में वर्णित आयुर्वेद पुस्तकों के अनुसार च्यवनप्राश बनाने वाला कोई अन्य निर्माता औषधि लाइसेंस रखता है और उत्पादन करता है, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उसे आयुर्वेद का ज्ञान नहीं है।
न्यायाधीश ने कहा, “किसी उत्पाद की प्रशंसा करना और यह कहना कि वह प्रतिद्वंद्वी के उत्पादों से बेहतर है, कार्रवाई योग्य नहीं है। हालांकि, प्रतिस्पर्धी के उत्पादों की गुणवत्ता के बारे में गलत बयान देना अपमान की श्रेणी में आएगा।”
अदालत ने कहा कि वह टेलीविजन चैनलों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विविध व व्यापक दर्शक वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक विज्ञापनों का दर्शक वर्ग बड़ा है और दर्शकों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे उनकी पसंद और प्राथमिकताएं प्रभावित होती हैं।
न्यायाधीश ने कहा, “टीवी विज्ञापन प्रस्तुति के तरीके से सभी च्यवनप्राश निर्माताओं को बदनाम करने का प्रयास है।”
डाबर द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि "पतंजलि स्पेशल च्यवनप्राश" के विज्ञापन में "विशेष रूप से डाबर च्यवनप्राश" और सामान्य रूप से हर च्यवनप्राश का अपमान किया गया।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 जुलाई की तारीख तय की है।
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