जरुरी जानकारी | तेल तिलहन में गिरावट, शुल्कमुक्त आयात की छूट से देश के घरेलू तेल तिलहन उद्योग की परेशानी बढ़ी

नयी दिल्ली, छह अप्रैल विदेशों में कमजोरी के रुख के बीच दिल्ली तेल- तिलहन बाजार में बृहस्पतिवार को वैसे तो सभी तेल-तिलहन कीमतों में गिरावट देखने को मिली लेकिन इस गिरावट की चोट से देश का तेल तिलहन उद्योग पर अस्तित्व का खतरा पैदा हो सकता है।

बाजार सूत्रों ने कहा कि मलेशिया एक्सचेंज में एक प्रतिशत की गिरावट रही, जबकि शिकॉगो एक्सचेंज कल रात 2.25 प्रतिशत नीचे था और फिलहाल यहां 1.5 प्रतिशत की गिरावट है।

सूत्रों ने कहा कि तेल तिलहन कीमतों में गिरावट को आम तौर पर खाद्यतेलों का सस्ता होना माना जाता है लेकिन मौजूदा गिरावट, विदेशों से शुल्कमुक्त आयात की छूट के बाद भारी मात्रा में हुए आयात की वजह से है। विदेशी आयातित तेलों के दाम इतने कम हो गये हैं कि देशी सरसों, सोयाबीन और बिनौला जैसे तिलहन फसलें का बिकना मुश्किल हो गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य को ध्यान में रखकर चलें तो देशी तेल तिलहनों की लागत अधिक बैठती है और इस वजह से उसके लिवाली कम है। नरम आयातित तेल, सूरजमुखी 80 रुपये लीटर थोक में बंदरगाह पर बिक रहा है। सरसों की लागत लगभग 125-135 रुपये लीटर बैठती है। यही कारण है कि सरसों बाजार में खप ही नहीं रहा है। कई स्थानों पर सरसों का दाम घटाकर 4,900 रुपये क्विन्टल बोला जा रहा है, फिर भी इसके लिवाल नहीं हैं।

सूत्रों ने कहा कि कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वायदा कारोबार खुलवाने की नाकाम कोशिशों के बाद दूसरा रास्ता अख्तियार करने में लगे है। यह अफवाह फैलायी जा रही हैं कि सरकार आयात शुल्क के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेगी। वायदा कारोबार चल रहा होता तो उन्हें भाव तोड़कर किसानों से सस्ते में खरीद करने की आसानी हो सकती थी। सूत्रों ने कहा कि कुल मिलाकर शुल्क मुक्त आयात की छूट का अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाया, उल्टे इससे देशी तेल मिलें ठप्प पड़ गयीं क्योंकि सस्ते आयातित तेलों के आगे देशी तिलहनों की पेराई में इन तेल मिलों को नुकसान है। इस स्थिति की वजह से देशी तेल मिलों पर अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है और सरकार को इस बात को संज्ञान में लेकर विदेशी आयातित तेलों को नियंत्रित कर देशी तेल तिलहनों का बाजार विकसित करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

सूत्रों ने कहा कि इन आयातित तेलों में अगर सूरजमुखी का उदाहरण लें तो बंदरगाह पर इसका थोक भाव 80 रुपये लीटर पड़ता है लेकिन थोक और खुदरा बाजार में यही तेल प्रीमियम राशि के साथ बेचा जा रहा है। खुदरा बाजार में यही 80 रुपये लीटर वाला तेल 140-150 रुपये लीटर मिल रहा है जिसकी बाजार में जाकर जांच की जा सकती है। सूत्रों ने कहा कि क्या इस शुल्कमुक्त आयात की छूट सस्ते खाद्यतेल को प्रीमियम पर बेचने के लिए दी गई थी या ग्राहकों को सस्ते में उपलब्ध कराने के लिए दी गई थी। शुल्कमुक्त खाद्यतेल आयात की छूट के कारण सरकार को तो राजस्व का नुकसान हुआ ही इसके बदले उपभोक्ताओं को भी कोई फायदा नहीं हुआ। सस्ते आयातित तेल आज देशी तेल उद्योग के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है जो असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।

सूत्रों ने कहा कि रेपसीड भी ‘सॉफ्ट आयल’ की श्रेणी में आता है और इस पर सरकार ने 38.5 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा रखा है। ऐसा संभवत: सरसों किसानों के हितों के बचाव के लिए किया गया है लेकिन सूत्रों का मानना है कि रेपसीड का सरसों से कोई मुकाबला ही नहीं है। रेपसीड को रिफाइंड करना पड़ता है जबकि देशी सरसों, पीली सरसों को सीधा खाया जाता है। देशी सरसों में ‘झांस’ (आंखों में जलन का अनुभव कराने वाला अवयव) होता है जो बाकी खाद्यतेल में नहीं है। सूत्रों ने कहा कि अगर देशी तेल तिलहन कारोबार को अपने पैरों पर नहीं खड़ा करना है और खाद्यतेलों को सस्ता बनाना ही प्राथमिकता है तो पामोलीन और रेपसीड पर भी आयात शुल्क को हटा देना चाहिये।

सूत्रों ने कहा कि देश के बड़े तेल संगठनों को बाजार की यथार्थ स्थिति और चिंता के बारे में सरकार को अवगत करना फर्ज बनता है। इसके बारे में और कौन अपनी बात रखेगा ?

सूत्रों ने कहा कि देश में सूरजमुखी के मामले में जो अनुभव रहा है उसपर गौर किया जाना चाहिये। शुल्कों की निरंतर घट बढ़ जैसी अनिश्चितताओं के कारण आज सूरजमुखी की पैदावार घटकर लगभग 10 प्रतिशत रह गई है। इसी कारण 6,400 रुपये का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) होने के बावजूद किसान इसकी बुवाई में दिलच्स्पी कम किये हुए हैं और पैदावार ठहराव की स्थिति में है।

सूत्रों ने कहा कि पिछले साल किसानों को सरसों के अच्छे दाम मिलने और सरसों की अच्छी पैदावार के बाद सरसों डीआयल्ड केक (डीओसी) का रिकार्ड निर्यात हुआ और दूध के दाम भी आज के दाम से 8-10 रुपये लीटर कम थे। देशी तिलहन भारी मात्रा में मवेशीचारे और मुर्गीदाने के लिए खल और डीओसी हमें उपलब्ध कराते हैं। पर सस्ते आयातित तेलों के कहर की वजह से इन दिनों खल के दाम निरंतर बढ़ रहे हैं और दूध कीमतों में भी कई बार बढ़ोतरी हो चुकी है।

बृहस्पतिवार को तेल-तिलहनों के भाव इस प्रकार रहे:

सरसों तिलहन - 5,415-5,510 (42 प्रतिशत कंडीशन का भाव) रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली - 6,815-6,875 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली तेल मिल डिलिवरी (गुजरात) - 16,680 रुपये प्रति क्विंटल।

मूंगफली रिफाइंड तेल 2,540-2,805 रुपये प्रति टिन।

सरसों तेल दादरी- 10,700 रुपये प्रति क्विंटल।

सरसों पक्की घानी- 1,690-1,760 रुपये प्रति टिन।

सरसों कच्ची घानी- 1,690-1,810 रुपये प्रति टिन।

तिल तेल मिल डिलिवरी - 18,900-21,000 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल मिल डिलिवरी दिल्ली- 11,400 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन मिल डिलिवरी इंदौर- 11,250 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन तेल डीगम, कांडला- 9,600 रुपये प्रति क्विंटल।

सीपीओ एक्स-कांडला- 9,000 रुपये प्रति क्विंटल।

बिनौला मिल डिलिवरी (हरियाणा)- 10,000 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन आरबीडी, दिल्ली- 10,400 रुपये प्रति क्विंटल।

पामोलिन एक्स- कांडला- 9,550 रुपये (बिना जीएसटी के) प्रति क्विंटल।

सोयाबीन दाना - 5,400-5,450 रुपये प्रति क्विंटल।

सोयाबीन लूज- 5,150-5,250 रुपये प्रति क्विंटल।

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