देश की खबरें | भाकपा (माले) लिबरेशन ने माकपा के ‘नव-फासीवादी’ नोट पर सवाल उठाए

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने शनिवार को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के उस नोट को अस्वीकार कर दिया जिसमें स्पष्ट किया गया है कि वह मोदी सरकार या भारतीय राज्य व्यवस्था को ‘नव-फासीवादी’ नहीं मानती है।

नयी दिल्ली, एक मार्च भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने शनिवार को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के उस नोट को अस्वीकार कर दिया जिसमें स्पष्ट किया गया है कि वह मोदी सरकार या भारतीय राज्य व्यवस्था को ‘नव-फासीवादी’ नहीं मानती है।

भट्टाचार्य ने कहा कि इस मोड़ पर ‘फासीवादी खतरे को कम करके आंकने’ से वामपंथियों की चुनावी ताकत और नैतिक अधिकार को केवल नुकसान होगा।

उनकी टिप्पणी मकपा द्वारा पार्टी की आगामी कांग्रेस के लिए मसौदा राजनीतिक प्रस्ताव पर अपनी राज्य इकाइयों को नोट जारी करने के कुछ दिनों बाद आई और इस बात पर जोर दिया कि यह रुख माकपा और भाकपा (माले) के रुख से अलग है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) लिबरेशन की वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख में भट्टाचार्य ने सवाल किया कि क्या माकपा का रुख पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी द्वारा सामना की जा रही तत्काल चुनावी परिस्थितियों के कारण है और क्या कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी ‘‘आज के केंद्रीय राजनीतिक प्रश्न को ओझल करके अपनी ताकत और भूमिका बढ़ा सकती है।’’

माकपा के मसौदा राजनीतिक प्रस्ताव पर अप्रैल में तमिलनाडु के मदुरै में पार्टी कांग्रेस में चर्चा की जाएगी। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘‘प्रतिक्रियावादी हिंदुत्व एजेंडा थोपने का दबाव तथा विपक्ष और लोकतंत्र को दबाने की सत्तावादी कोशिशें नव-फासीवादी विशेषताओं को प्रदर्शित करती हैं।’’

लेकिन माकपा ने नोट में स्पष्ट किया है कि राजनीतिक व्यवस्था में ‘नव-फासीवादी विशेषताओं’ को दर्शाने की बात करने का मतलब यह नहीं है कि पार्टी मोदी सरकार को फासीवादी या नव-फासीवादी कह रही है।

इस पर टिप्पणी करते हुए भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘शायद ‘नव-फासीवादी’ शब्द ने माकपा के कार्यकर्ताओं को भ्रमित कर दिया है कि वर्तमान संदर्भ में माकपा और भाकपा(माले) के बीच मुख्य अंतर केवल ‘नव’ विशेषण के इर्द-गिर्द ही घूमता है।’’

उन्होंने कहा कि नोट में यह ‘स्पष्टीकरण’ देने का कष्ट उठाना पड़ा कि अभी भारत में फासीवाद केवल एक प्रवृत्ति है, प्रदर्शित विशेषताएं केवल उभर रही हैं तथा वे शासन की प्रकृति को परिभाषित करने के लिए पर्याप्त रूप से दृढ़ या निर्णायक नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि माकपा भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रगतिशील राय से सहमत है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को ‘‘फासीवादी’’ मानती है। बाबरी मस्जिद के विध्वंस को ‘‘संघ ब्रिगेड की निर्लज्ज फासीवादी साजिश की पहली झलक’’ बताते हुए उन्होंने कहा कि भाकपा (माले) इस क्षण को भारत की समग्र संस्कृति और संवैधानिक गणराज्य के लिए एक सांप्रदायिक फासीवादी खतरे के रूप में पहचानती है और विनोद मिश्रा और सीताराम येचुरी, दोनों ने आरएसएस की ‘‘साजिश’’ के बारे में विस्तार से लिखा है।

माकपा पर कटाक्ष करते हुए भट्टाचार्य ने आशा व्यक्त की कि पार्टी की ‘फासीवाद के आगमन की पहचान करने और उसका नामकरण करने से जुड़ी दुविधा’ पार्टी के समक्ष मौजूद तात्कालिक चुनावी परिस्थितियों के कारण नहीं है।

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