नयी दिल्ली, 26 जून उत्तर प्रदेश सरकार को राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश के एक हिस्से पर रोक लगा दी जिसमें 2019 में राज्य के ‘आयुष’ कॉलेजों में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश में कथित कदाचार की जांच करने का निर्देश सीबीआई को दिया गया था।
यह आदेश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की अवकाश पीठ ने राज्य सरकार की अपील पर पारित किया।
राज्य सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के 24 मई के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है, जिसमें सीबीआई को मामला दर्ज करने और उत्तर प्रदेश के पूर्व आयुष मंत्री धर्म सिंह सैनी, तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव,आयुष विभाग, प्रशांत त्रिवेदी एवं अन्य के खिलाफ रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच करने को कहा गया है।
उच्च न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से एक अगस्त तक मामले में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा था।
उच्च न्यायालय ने डॉ. रितु गर्ग की जमानत याचिका मंजूर करते हुए सीबीआई जांच के आदेश पारित किए थे।
शीर्ष अदालत की अवकाश पीठ ने सोमवार को राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज की दलीलों पर ध्यान दिया और उच्च न्यायालय के आदेश के सीबीआई जांच से संबंधित हिस्से पर रोक लगा दी।
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर गर्ग और अन्य को नोटिस भी जारी किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने गर्ग को जमानत दिए जाने पर भी नाखुशी जाहिर की।
इससे पहले, उच्च न्यायालय ने गर्ग की जमानत याचिका को मंजूरी दे दी थी और आयुर्वेद निदेशालय के प्रभारी अधिकारी डॉ. उमाकांत सिंह का बयान सुना था, जिन्होंने पुलिस को एक विस्तृत बयान दिया था कि पूर्व मंत्री, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी त्रिवेदी और आयुष विभाग के अन्य प्रमुख अधिकारियों के बीच रिश्वत कैसे वितरित की गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा था, “स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए शीर्ष अदालत के एक आदेश के अनुपालन के नाम पर अधिकारियों द्वारा इस तरह के गलत काम को देखने, पात्र छात्रों को वंचित करने तथा साथ ही साथ जांच एजेंसी की तरफ से गंभीर चूक का पता चलने पर, जिसके न्याय वितरण प्रणाली के लिए घातक परिणाम हो सकते हैं, यह अदालत अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती।”
गर्ग ने उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दायर करते हुए कहा था कि उन्हें राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (एनईईटी) 2021-22 फर्जी प्रवेश मामले में झूठा फंसाया गया था। उन्हें जमानत देते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा था कि रिकॉर्ड में परीक्षा परिणामों को गलत साबित करने में उसकी संलिप्तता का संकेत देने वाला कोई सबूत नहीं है।
उच्च न्यायालय ने इस पर भी ध्यान दिया था कि जांच अधिकारी ने उमाकांत सिंह का बयान दर्ज किया था, जिन्होंने 2019 के प्रवेश में भ्रष्टाचार के बारे में स्पष्ट रूप से बात की थी और दावा किया था कि सैनी ने अपने आवास पर 35 लाख रुपये की रिश्वत ली थी, जबकि त्रिवेदी ने 25 लाख रुपये लिए थे।
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