देश की खबरें | न्यायालय ने आंतरिक शिकायत समिति के सदस्यों की नौकरी सुरक्षा संबंधी याचिका पर ने केंद्र से मांगा जवाब
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) कानून के तहत गठित आंतरिक शिकायत समितियों के सदस्यों की सेवा शर्तों को सुरक्षित करने के अनुरोध वाली याचिका पर विचार करने को लेकर शुक्रवार को सहमति जताई।
नयी दिल्ली, छह दिसंबर उच्चतम न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) कानून के तहत गठित आंतरिक शिकायत समितियों के सदस्यों की सेवा शर्तों को सुरक्षित करने के अनुरोध वाली याचिका पर विचार करने को लेकर शुक्रवार को सहमति जताई।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने जानकी चौधरी द्वारा दायर याचिका पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और अन्य को नोटिस जारी किया।
जनहित याचिका में निजी कार्यस्थलों पर ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ (पीओएसएच अधिनियम) के तहत गठित आंतरिक शिकायत समितियों (आईसीसी) के सदस्यों के लिए कार्यकाल की सुरक्षा और बदले की कार्रवाई से संरक्षण का अनुरोध किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता आभा सिंह ने मुद्दे को संवेदनशील बताते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक आईसीसी की अध्यक्ष हैं तथा उन्हें निजी कार्यस्थलों पर समिति के सदस्यों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का प्रत्यक्ष अनुभव है।
मुख्य याचिकाकर्ता जानकी चौधरी आईसीसी समिति की पूर्व सदस्य हैं और सह-याचिकाकर्ता ओल्गा टेलिस सेवानिवृत्त पत्रकार हैं, जिन्होंने अधिवक्ता मुनव्वर नसीम के माध्यम से दायर अपनी जनहित याचिका में दावा किया है कि निजी क्षेत्र में आईसीसी की महिला सदस्यों को उसी स्तर का संरक्षण और कार्यकाल की सुरक्षा प्राप्त नहीं है, जो सार्वजनिक क्षेत्र की आईसीसी सदस्यों को प्राप्त है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि आईसीसी सदस्यों को कंपनी के वेतन पर रहते हुए यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर निर्णय लेने का दायित्व सौंपा गया है, लेकिन यदि कोई निर्णय निजी कार्यस्थल के वरिष्ठ प्रबंधन के विरुद्ध जाता है तो उन्हें बिना कोई कारण बताए (तीन महीने के वेतन के साथ) सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है।
याचिका में कहा गया, ‘‘इससे हितों का गंभीर टकराव पैदा होता है और आईसीसी सदस्यों के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और पक्षपात रहित निर्णय लेने में बाधाएं उत्पन्न होती हैं...यदि वे वरिष्ठ प्रबंधन की इच्छा के विरुद्ध कोई निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अनुचित बर्खास्तगी और पदावनत जैसे उत्पीड़न और प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है।’’
याचिका में कहा गया है कि निजी क्षेत्र के आईसीसी सदस्यों के पास प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई सहारा नहीं है, न ही वे अपनी बर्खास्तगी (उनके द्वारा लिए गए निर्णयों के आधार पर) को उचित मंच पर चुनौती दे सकते हैं।
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(The above story first appeared on LatestLY on Dec 06, 2024 09:36 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

