नयी दिल्ली, 11 सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने शिक्षाविद अशोक स्वैन के भारतीय विदेशी नागरिकता (ओसीआई) कार्ड को रद्द किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सोमवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिका पर गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के जरिए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और उसे जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया।
अदालत ने मामले पर अगली सुनवाई के लिए नौ नवंबर की तारीख तय की। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि स्वैन की 78 वर्षीय मां भारत में रहती हैं और वह बीमार हैं तथा वह इकलौते बेटे हैं और पिछले तीन साल से भारत नहीं आ पाए हैं।
उनके वकील ने कहा कि उनका भारत आना और अपनी बीमार मां की देखभाल करना बहुत जरूरी है।
स्वीडन के निवासी स्वैन ने उनका ओसीआई कार्ड रद्द करने के 30 जुलाई के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख करते हुए कहा कि प्रासंगिक तथ्यों और सबूतों पर गौर किए बिना यह फैसला किया गया।
वकील आदिल सिंह बोपाराय, सृष्टि खन्ना और सादिक नूर के जरिए दायर याचिका में कहा गया है, ‘‘प्रतिवादी (केंद्र) का कथित मामला है कि याचिकाकर्ता (स्वैन) को विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर अपने लेखन तथा भाषणों के जरिए कथित तौर पर हानिकारक दुष्प्रचार करने के लिए, भारत विरोधी गतिविधियों के तहत काली सूची में डाल दिया गया लेकिन इस विवादित आदेश में ऐसी कोई विशेष घटना/ट्वीट/लेखन या कारण नहीं दिया गया है जो प्रतिवादी संख्या तीन (स्वीडन तथा लात्विया में भारतीय दूतावास) के इस दावे को दिखाता हो कि याचिकाकर्ता कथित तौर पर सार्वजनिक मंचों पर हानिकारक दुष्प्रचार फैला रहा है।’’
इसमें कहा गया है कि 30 जुलाई का आदेश उचित नहीं है क्योंकि इसमें याचिकाकर्ता के ओसीआई कार्ड को रद्द किए जाने को न्यायोचित ठहराने वाली किसी सामग्री का जिक्र नहीं किया गया है।
स्वैन ने कहा कि एक शिक्षाविद के तौर पर वह मौजूदा सरकार की कुछ नीतियों का विश्लेषण और उनकी आलोचना करते हैं तथा सरकार की नीतियों पर उनके विचारों के लिए उन्हें परेशान नहीं किया जा सकता है।
याचिका में कहा गया है, ‘‘एक शोधार्थी के रूप में समाज में उनकी भूमिका अपने काम के जरिए सरकार की नीतियों पर चर्चा करने तथा उसकी आलोचना करना है। याचिकाकर्ता को मौजूदा सरकार की राजनीतिक व्यवस्था या उसकी नीतियों पर उनके विचार के लिए परेशान नहीं किया जा सकता।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘सरकार की कुछ नीतियों की आलोचना भड़काऊ भाषण या भारत विरोधी गतिविधि नहीं मानी जाएगी।’’
स्वीडन में उप्पसला विश्वविद्यालय के शांति व संघर्ष अनुसंधान विभाग के प्रमुख और प्रोफेसर स्वैन ने आठ फरवरी 2022 के केंद्र सरकार के आदेश के जरिए उनका ओसीआई कार्ड रद्द किए जाने को चुनौती देते हुए पहले भी उच्च न्यायालय का रुख किया था।
उच्च न्यायालय ने 10 जुलाई को सरकार का आदेश रद्द करते हुए कहा था कि आदेश में कोई कारण नहीं बताया गया और ‘‘इसमें शायद ही कोई समझदारी दिखाई गई है।’’
उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘धारा (जिसके तहत ओसीआई कार्ड रद्द किया गया था) को एक मंत्र के रूप में दोहराने के अलावा, आदेश में कोई कारण नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ता का ओसीआई कार्ड धारक के रूप में पंजीकरण क्यों रद्द किया गया।’’
अदालत ने केंद्र को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने के कारण बताते हुए तीन सप्ताह के भीतर एक विस्तृत आदेश पारित करने का निर्देश दिया था।
याचिका में कहा गया है कि विस्तृत आदेश देने के उच्च न्यायालय के ऐसे विशिष्ट और स्पष्ट निर्देशों के बावजूद प्राधिकारियों ने कानून के प्रावधानों की महज व्याख्या करके इसे संवेदनहीन तरीके से पेश किया गया।
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