देश की खबरें | न्यायालय का आईएसआईएस के कथित सदस्य को जमानत देने के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार

नयी दिल्ली, 11 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) का सदस्य होने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 28 वर्षीय व्यक्ति को जमानत देने के बंबई उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से शुक्रवार को इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि यह अच्छा फैसला है और उच्च न्यायालय ने अपने निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पर्याप्त कारण बताए हैं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उनकी एकमात्र चिंता यह है कि उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत के 2015 के श्रेया सिंघल के फैसले का अपने आदेश में संदर्भ दिया और मौलिक अधिकार का उल्लेख किया।

मेहता ने कहा कि प्रतिबंधित संगठन आईएसआईएस की हिमायत करना अपने आप में एक अपराध है।

पीठ ने कहा कि श्रेया सिंघल के संदर्भ के बिना भी, जो अनावश्यक था, निर्णय को कायम रखा जा सकता था। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय की टिप्पणियां मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर आधारित थी।

श्रेया सिंघल के फैसले में शीर्ष अदालत ने सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66ए को खत्म कर दिया था जिसके तहत आपत्तिजनक संदेश पोस्ट करने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की कैद और जुर्माने का भी प्रावधान था।

पिछले साल 13 अगस्त को बंबई उच्च न्यायालय ने इकबाल अहमद कबीर अहमद को जमानत दे दी थी, जिसने एक विशेष अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। विशेष अदालत ने अहमद को जमानत देने से इनकार कर दिया था।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के तहत जमानत देने पर रोक है, लेकिन मामले में आरोपी अहमद को मुकदमे का सामना करने का अवसर दिए बिना सलाखों के पीछे रखना उसके जीवन और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होगा।

अदालत ने अहमद को पहले महीने के लिए सप्ताह में दो बार और फिर अगले दो महीनों के लिए सप्ताह में एक बार राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) के सामने पेश होने का निर्देश दिया। अहमद को आतंकवादी संगठन का हिस्सा होने के आरोप में सात अगस्त 2016 को गिरफ्तार किया गया था और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और यूएपीए के कड़े प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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