देश की खबरें | न्यायालय प्रवासियों को उनके गंतव्य पहुंचाने केन्द्र, राज्यों को 15 दिन का वक्त देने पर विचार कर रहा
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय , कोविड-19 की वजह से अपने घर लौटने के इच्छुक सभी प्रवासी कामगारों को उनके पैतृक स्थान पहुंचाने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों को 15 दिन का वक्त देने के बारे में सोच रहा है। न्यायालय ने कहा कि प्राधिकारियों को रोजगार के अवसर प्रदान करने सहित कल्यणकारी उपायों के लाभ देने के लिये इन सभी कामगारों का पंजीकरण करना चाहिए।
नयी दिल्ली, पांच जून उच्चतम न्यायालय , कोविड-19 की वजह से अपने घर लौटने के इच्छुक सभी प्रवासी कामगारों को उनके पैतृक स्थान पहुंचाने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों को 15 दिन का वक्त देने के बारे में सोच रहा है। न्यायालय ने कहा कि प्राधिकारियों को रोजगार के अवसर प्रदान करने सहित कल्यणकारी उपायों के लाभ देने के लिये इन सभी कामगारों का पंजीकरण करना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने रास्तों में फंसे इन प्रवासी कामगारों की दयनीय स्थिति का स्वत: ही संज्ञान लेते हुये 28 मई को निर्देश दिया था कि इनसे ट्रेन या बसों का किराया नहीं लिया जाना चाहिए और इन सभी को नि:शुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
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न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने वीडियो कांफ्रेन्स के माध्यम से विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि कामगारों को ले जाने , पंजीकरण और उनके रोजगार से संबंधित मामले में नौ जून को उचित आदेश सुनाया जायेगा।
इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने लॉकडाउन की वजह से रास्तों में फंसे इन श्रमिकों की पीड़ा कम करने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा किये गये उपायों पर गौर किया। केन्द्र और राज्य सरकारों ने पीठ को इन श्रमिकों को उनके पैतृक स्थान भेजने के बारे में किये गये उपायों की विस्तार से जानकारी दी।
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सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि केन्द्र अपनी तरफ से भरसक आवश्यक कदम उठा रहा है और उसने प्रवासी श्रमिकों को उनके पैतृक स्थान तक पहुंचाने के लिये तीन जून तक 4,200 से अधिक ‘विशेष श्रमिक ट्रेन’ चलाई हैं।
मेहता ने कहा कि अभी तक एक करोड़ से ज्यादा श्रमिकों को उनके गंतव्य तक पहुंचाया गया है और अधिकतर ट्रेनें उत्तर प्रदेश और बिहार गई हैं।
इस दौरान पीठ ने कहा कि वह इन कामगारों को भेजने और उनके पंजीकरण तथा इन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करने की व्यवस्था तैयार करने के लिये केन्द्र और सभी राज्य सरकारों को 15 दिन का समय देने पर विचार कर रही है।
मेहता ने कहा कि राज्य सरकारें बता सकती हैं कि उन्हें अभी और कितने प्रवासी कामगारों को उनके पैतृक स्थानों पर भेजने की आवश्यकता है और इसके लिये कितनी रेलगाड़ियों की जरूरत होगी।
सॉलिसीटर जनरल ने पीठ को भरोसा दिलाया कि संबंधित राज्यों को आवश्यक रेलगाड़ियां उपलब्ध करायी जा रही हैं और भविष्य में भी अगर मांग की गयी तो उन्हें ट्रेनें मुहैया कराई जायेंगी।
मेहता ने कहा कि राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर पूछा गया है कि कितने कामगारों को भेजा जाना है और इसके लिये कितनी ट्रेनों की जरूरत है।
न्यायालय ने कहा कि अपने पैतृक स्थानों पर लौटने वाले कामगारों के रोजगार के लिये योजनाएं तैयार करनी होंगी और उनकी काउन्सलिंग करने की भी जरूरत होगी।
इस बीच, इस मामले में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी हस्तक्षेप किया और सुझाव दिया कि इन प्रवासी कामगारों की दयनीय स्थिति में सुधार के लिये अल्पकालीन और दीर्घकालीन उपाय करने की आवश्यकता है। केन्द्र ने इस मामले में आयोग के हस्तक्षेप का विरोध नहीं किया।
हालाकि, न्यायालय ने इसी विषय पर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के आवेदन पर विचार करने में अनिच्छा दिखाई और कहा, ‘‘ वह संसद की सम्मानित सदस्य है और अगर हम इसकी अनुमति देंगे तो इससे अव्यवस्था की स्थिति बन जायेगी।’’
पीठ ने कहा, ‘‘हमारे पास मदद के लिये केन्द्र और राज्यों के वकील हैं और आप अगर कुछ कहना चाहती हैं तो कह सकती हैं।’’
पीठ को बताया गया कि रेलवे ने महाराष्ट्र से देश के दूसरे स्थानों के लिये 802 रेलगाड़ियां चलाई हैं और अगर राज्य फिर ट्रेनों के लिये अनुरोध करेगा तो एक दिन के भीतर ही इन्हें मुहैया करा दिया जायेगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोन्साल्विज ने केन्द्र के कथन का विरोध किया ओर कहा कि कामगारों की सूची तैयार करने के लिये पंजीकरण व्यवस्था की कार्यशैली में दिक्कत है क्योंकि इसके लिये बना फार्म अंग्रेजी में है।
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