कोच्चि, 13 नवंबर केरल उच्च न्यायालय ने एक मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को बुधवार को रद्द कर दिया जिसमें एक गृहिणी द्वारा दायर यौन उत्पीड़न की शिकायत पर मलप्पुरम जिले के कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
मुख्य न्यायाधीश नितिन जामदार और न्यायमूर्ति एस. मनु की खंडपीठ ने शिकायत में आरोपी पुलिस अधिकारियों में से एक विनोद वलियातूर की अपील स्वीकार कर ली। उक्त अपील में एकल न्यायाधीश के 18 अक्टूबर के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने कथित तौर पर मजिस्ट्रेट अदालत को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश देने के लिए मजबूर किया।
उच्च न्यायालय का विचार था कि एकल न्यायाधीश के 18 अक्टूबर के आदेश ने 24 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट अदालत को पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने के लिए प्रभावित किया।
पीठ ने मजिस्ट्रेट अदालत के 24 अक्टूबर के आदेश को भी रद्द कर दिया।
शिकायतकर्ता गृहिणी ने एक करीबी दोस्त के साथ तब मजिस्ट्रेट अदालत का रुख किया था जब स्थानीय पुलिस ने बलात्कार की उनकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की थी।
दोनों महिलाओं के अनुसार, थाना प्रभारी और जिला पुलिस प्रमुख, मलप्पुरम को कई शिकायतें देने के बावजूद कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। दोनों ने निचली अदालत के समक्ष अपनी याचिका में, पुलिस को एक प्राथमिकी दर्ज करने और आरोपों की जांच करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
जब मजिस्ट्रेट अदालत ने शुरू में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 (4) के तहत पुलिस से रिपोर्ट मांगी, तो महिलाओं ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया। बीएनएसएस की धारा 175 (4) में कहा गया है कि किसी लोक सेवक के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान शिकायत प्राप्त होने पर, मजिस्ट्रेट अदालत शिकायत के लिए परिस्थितियों के बारे में रिपोर्ट मांगने के बाद जांच का आदेश दे सकती है।
शिकायतकर्ता महिलाओं ने उच्च न्यायालय से यह सुनिश्चित करने का आग्रह भी किया कि उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का अनुपालन करते हुए प्राथमिकी दर्ज होने के बाद ही गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं।
एकल न्यायाधीश ने महिलाओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए 13 सितंबर को मजिस्ट्रेट अदालत से बीएनएसएस की धारा 175(4) के तहत उसके प्रारंभिक निर्णय की व्याख्या करने वाली रिपोर्ट मांगी।
खंडपीठ ने उल्लेख किया कि मजिस्ट्रेट अदालत से रिपोर्ट प्राप्त करने पर, एकल न्यायाधीश ने आदेश दिया कि बीएनएसएस की धारा 175(4) अनिवार्य नहीं और निचली अदालत को दस दिनों के भीतर कानून की इस घोषणा के अनुसार आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय ने बुधवार को महिलाओं द्वारा लगाए गए आरोपों की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन एकल न्यायाधीश के निर्देश में प्रक्रियात्मक खामियों पर भी चिंता व्यक्त की।
उच्च न्यायालय ने कहा कि 24 अक्टूबर को पारित मजिस्ट्रेट अदालत का आदेश एकल न्यायाधीश के पहले के निर्देशों से प्रभावित प्रतीत होता है और इसलिए यह एक स्वतंत्र निर्णय नहीं था।
उसने कहा कि न्यायिक दबाव के कारण मजिस्ट्रेट अदालत को अपनी कार्यवाही में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा और परिणामस्वरूप, 24 अक्टूबर को पारित आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मामले को अब इसके कानूनी गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए और मजिस्ट्रेट अदालत को बिना किसी बाहरी प्रभाव के मामले पर नये सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।
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