देश की खबरें | न्यायालय ने हाथरस की घटना को लोमहर्षक बताते हुये उप्र सरकार से गवाह संरक्षण पर मांगी रिपोर्ट

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने हाथरस में एक दलित लड़की से कथित बलात्कार और बाद में उसकी मृत्यु की घटना को मंगलवार को बेहद ‘लोमहर्षक’ और ‘हतप्रभ’ करने वाली बताया और कहा कि वह इसकी सुचारू ढंग से जांच सुनिश्चित करेगा। न्यायालय ने इसके साथ ही उप्र सरकार से आठ अक्टूबर तक हलफनामे पर यह जानना चाहा है कि इस मामले के गवाहों का संरक्षण किस तरह हो रहा है।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, छह अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने हाथरस में एक दलित लड़की से कथित बलात्कार और बाद में उसकी मृत्यु की घटना को मंगलवार को बेहद ‘लोमहर्षक’ और ‘हतप्रभ’ करने वाली बताया और कहा कि वह इसकी सुचारू ढंग से जांच सुनिश्चित करेगा। न्यायालय ने इसके साथ ही उप्र सरकार से आठ अक्टूबर तक हलफनामे पर यह जानना चाहा है कि इस मामले के गवाहों का संरक्षण किस तरह हो रहा है।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमणियन की पीठ से उप्र सरकार ने इस मामले की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में केन्द्रीय एजेन्सी से कराने का आदेश देने का अनुरोध किया।

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वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि इस घटना में एक निर्दोष लड़की की जान चली गयी है। राज्य सरकार ने इस मामले में एक हलफनामा भी दायर किया है।

राज्य सरकार ने इस मामले में राजनीतिक मकसद से फैलाई जा रही फर्जी और झूठी कहानियों पर अंकुश लगाने के लिये न्यायिक हस्तक्षेप की पीठ से पुरजोर गुजारिश की।

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पीठ ने कहा, ‘‘हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इसकी जांच सुचारू ढंग से हो’’ और इसके साथ ही उसने उप्र सरकार को इस मामले में गवाहों के संरक्षण के लिये उठाये गये कदमों के बारे हलफनामा दाखिल करने और यह बताने का भी निर्देश दिया कि क्या पीड़ित परिवार ने किसी वकील का चुनाव किया है ?

पीठ ने कहा, ‘‘हम हलफनामे पर यह जानना चाहते हैं कि हाथरस मामले के गवाहों का संरक्षण किस तरह किया जा रहा है। हम इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कार्यवाही का दायरा जानना चाहते हैं और यह संभावना तलाशना चाहते हैं कि कैसे इसका दायरा (शीर्ष अदालत में लंबित मामला) बढ़ाकर इसे प्रासंगिक बनाया जा सकता है।’’

पीठ ने इस मामले में पेश सभी पक्षों से कहा कि वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित कार्यवाही के दायरे के साथ साथ इस बारे में भी सुझाव दें कि शीर्ष अदालत इसे कैसे ज्यादा प्रासंगिक बना सकती है ।

पीठ ने कहा कि इस तथ्य के मद्देनजर कि राज्य सरकार इसे प्रतिद्वन्दी मुकदमा नहीं मान रही है, इस बारे में सालिसीटर जनरल को सुझाव दिये जा सकते हैं।

न्यायालय ने आपराधिक मामले से असम्बद्ध पक्ष की स्थिति पर सवाल उठाते हुये कहा, ‘‘हम इस घटना के बारे में कुछ नहीं कह रहे हैं। यह घटना लोमहर्षक, हतप्रभ करने वाली और असाधारण है लेकिन सवाल यह है कि हम एक ही जैसी कितनी दलीलें सुने? कृपया यह समझिये कि न्यायालय में अपनी चिंता को दोहराने की जरूरत नहीं है।’’

न्यायालय ने ये टिप्पणियां उस वक्त कीं जब वरिष्ठ अधिवक्ता इन्दिरा जयसिंह सहित कुछ वकीलों ने इस मामले में बहस करना शुरू कर दिया। न्यायालय ने कहा कि हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि न्यायालय को सभी से एक ही दलील बार बार सुनने की जरूरत नहीं है।

प्रदेश सरकार की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा, ‘‘ हाथरस मामले में एक के बाद एक कहानियां फैलाई जा रही हैं। इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है।’’

उन्होंने कहा कि इस मामले की सीबीआई जांच यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी निहित स्वार्थों के वास्ते अपने मकसदों के लिये फर्जी कहानियां नहीं बना सकेगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में सीबीआई की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में करायी जा सकती है।

मेहता ने कहा, ‘‘इस घटना में एक युवती की जान चली गयी है और किसी को भी इसे सनसनीखेज नहीं बनाना चाहिए। इसकी जांच स्वतंत्र होनी चाहिए और स्वतंत्र लगनी भी चाहिए।’’

इस मामले में चुनिन्दा हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इन्दिरा जयसिंह ने न्यायालय से अनुरोध किया कि पीड़ित परिवार को संरक्षण प्रदान किया जाये। उन्होंने कहा कि परिवार का कहना है कि इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने से वे संतुष्ट नहीं है।

उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल को इस मामले की जांच करनी चाहिए।

जयसिंह ने कहा कि गवाहों के संरक्षण की जरूरत है और इस मामले को स्थानांतरित किया जाये। यही नहीं, किसी भी वकील को यह मामला लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए और इसे नालसा को ही देखना चाहिए।

इस पर सालिसीटर जनरल ने कहा, ‘‘जयसिंह गवाहों के लिये संरक्षण की मांग कर रही हैं लेकिन बहुत लोगों को मालूम ही नहीं है कि गवाह पहले से ही संरक्षण में हैं।’’

इस अवसर पर पीठ ने जयसिंह से सवाल किया कि आप इस मामले में किस हैसियत से हैं।

पीठ ने जयसिंह से कहा, ‘‘‘‘इस मामले में तो आपका कोई अधिकार नहीं है। लेकिन, हम आपको सुन रहे हैं क्योंकि यह मामला बहुत ही महत्वपूर्ण है। हम आपको सुन रहे हैं क्योंकि यह बहुत ही हतप्रभ करने वाली घटना है। इसके बावजूद इस मामले में हम आपकी स्थिति के बारे में सोच रहे हैं।’’

कुछ महिला वकीलों की ओर से अधिवक्ता कीर्ति सिंह ने कहा कि इस मामले की जांच शीर्ष अदालत की देख-रेख में होनी चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह एक ‘लोमहर्षक’ घटना है लेकिन वह नहीं चाहती कि न्यायालय में एक ही बात बार-बार दोहरायी जाये।

पीठ ने कहा, ‘‘यह लोमहर्षक घटना है लेकिन सवाल यह है कि हम एक ही जैसी कितनी दलीलें सुने?

राज्य सरकार ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में कहा है कि यह महत्वपूर्ण है कि इस मामले की किसी स्वतंत्र केन्द्रीय एजेन्सी से जांच करायी जाये।

हलफनामे में कहा गया है कि राज्य सरकार पहले ही केन्द्र से अनुरोध कर चुकी है कि इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी जाये क्योंकि इससे कतिपय निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच में डाले जा रहे व्यवधानों से बचा जा सकेगा।

राज्य सरकार ने इस मामले की केन्द्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की सिफारिश की है और एफएसएल की रिपोर्ट का जिक्र करते हुये बलात्कार के आरोप से इंकार किया है।

हाथरस के एक गांव में 14 सितंबर को 19 वर्षीय दलित लड़की से अगड़ी जाति के चार लड़कों ने कथित रूप से बलात्कार किया था। इस लड़की की 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो गयी थी।

पीड़ित की 30 सितंबर को रात के अंधेरे में उसके घर के पास ही अंत्येष्टि कर दी गयी थी। उसके परिवार का आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने जल्द से जल्द उसका अंतिम संस्कार करने के लिये मजबूर किया। स्थानीय पुलिस अधिकारियों का कहना है कि परिवार की इच्छा के मुताबिक ही अंतिम संस्कार किया गया।

अनूप

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