नयी दिल्ली, नौ जनवरी तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के तहत दिल्ली की सीमाओं पिछले करीब 40 दिनों से डटे रहने के दृढ़ संकल्प के बावजूद कई प्रदर्शनकारी चिंता एवं अवसाद से ग्रहित हो रहे हैं तथा कुछ किसानों की इस कड़ाके की ठंड में कथित तौर पर मौत हो गई है।
विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारी संख्या में किसान 26 नवंबर से सिंघू बॉर्डर और दो अन्य स्थलों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन वर्तमान में उनकी ‘‘गतिहीन जीवन शैली’’ और ‘‘मनोवैज्ञानिक अवसाद’’ से उन शारीरिक और मानसिक प्रभाव पड़ रहा है।
सिंघू बॉर्डर पर चिकित्सा शिविर चलाने वाले गैर सरकारी संगठनों के अनुसार ये किसान काफी साहसी हैं, लेकिन कुछ प्रतिकूल मौसम की स्थितियों का सामना करने के चलते तनाव में हैं।
हालांकि, इनके मानसिक बोझ को कम करने के लिए अमेरिकी एनजीओ ‘यूनाइटेड सिख’ ने सिंघू बॉर्डर स्थित प्रदर्शन स्थल के हरियाणा की ओर स्थापित अपने शिविर में किसानों के लिए एक काउंसलिंग सत्र शुरू किया है।
शिविर में एक मनोवैज्ञानिक एवं स्वयंसेवक सान्या कटारिया ने कहा कि कई किसानों की इस आंदोलन के दौरान मृत्यु हो गई है और कुछ ने अपनी जान दे दी है। हो सकता है कि उनमें मजबूत दृढ़ संकल्प हो लेकिन अत्यधिक ठंड, कठित परिस्थितियों के साथ ही खेतों में सक्रिय नहीं रहने के कारण जीवन शैली में बदलाव के चलते उनके अवसाद से ग्रस्त होने की आशंका है।
नोएडा के एक निजी विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट इन साइकोलॉजी की छात्रा सान्या पिछले कुछ दिनों से यूनाइटेड सिख्स’ के माध्यम से अपनी सेवाएं दे रही हैं।
उन्होंने पीटीआई- से कहा कि ये किसान इस आंदोलन के तहत एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर 40 दिनों से अधिक समय से बैठे हुए हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश कठोर स्थिति और ठंड का सामना कर सकते हैं क्योंकि वे कड़ी मेहनत करने के आदी हैं लेकिन उनमें से कुछ चिंता, अवसाद से ग्रसित हो गए हैं। यह खतरनाक है।
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