विशेषज्ञों ने कई महीने पहले ही इस बाबत चेतावनी दी थी और अब काफी हद तक ये डर सामने आने लगा है।
दक्षिणी यमन में सुरक्षा उपकरणों की कमी का हवाला देते हुए बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी अपने पदों को छोड़ रहे हैं और कुछ अस्पताल श्वास संबंधी मरीजों को लौटा रहे हैं।
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वहीं, सूडान के युद्ध प्रभावित दारफुर प्रांत में परीक्षण की क्षमता बेहद कम है और यहां कोविड-19 के जैसे लक्षणों वाली रहस्यमय बीमारी शिविरों के जरिए फैल रही है।
इस बीच, भारत और पाकिस्तान में भी कोरोना वायरस संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इन देशों के अधिकारियों का कहना है कि गरीबी अधिक होने के कारण लंबे समय तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू रखना संभव नहीं है।
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उधर, लातिन अमेरिका में ब्राजील में वायरस के मामले अमेरिका के बाद सबसे अधिक हैं। इस देश में घातक वायरस से जान गंवाने वालों की संख्या भी काफी अधिक है। इसके नेताओं पर वायरस को काबू करने के लिए कारगर कदम उठाए जाने के इच्छुक नहीं होने के आरोप लग रहे हैं।
इसी तरह, मामले सामने आने के शुरुआती समय में ही लॉकडाउन लागू करने के बावजूद पेरु, चिली, इक्वाडोर और पनामा में हालात बिगड़ रहे हैं।
अफ्रीका महाद्वीप के अन्य देशों के मुकाबले दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था बेहतर है। इसके बाद भी वहां के अस्पतालों में मरीजों के लिए पर्याप्त इलाज मुहैया कराने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। एक अस्पताल पूरा भर जाने के बाद मरीजों को परिसर में बिस्तर पर लेटे देखा जा सकता है।
जोहानिसबर्ग में एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ फ्रांसिस वेंटर ने कहा, '' अब हम बवंडर का सामना कर रहे हैं।''
जॉन हॉप्किंस विश्वविद्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, विश्व में कोरोना वायरस संक्रमण के 1.1 करोड़ मामले सामने आ चुके हैं और अब तक पांच लाख से अधिक मौतें हो चुकी हैं।
''डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स'' के आपातकालीन विंग की प्रमुख केट व्हाइट ने कहा कि सुरक्षा उपकरणों की वैश्विक मांग के चलते इनके दामों में वृद्धि हुई है। जांच किट प्राप्त करने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह, मरीजों के लिए पृथक-वास की सुविधाओं और संक्रमित के संपर्कों का पता लगाने के लिए भी बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों की आवश्यकता है।
केट ने कहा, '' जब बात अन्य देशों के मुकाबले आर्थिक रूप से कमजोर देशों की आती है तो वे प्रतिकूल रूप से अधिक प्रभावित होंगे।''
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