देश की खबरें | विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण: शीर्ष अदालत के आदेश का अनुपालन करने का उच्च न्यायालय ने दिया निर्देश

नयी दिल्ली, पांच मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को केंद्र और दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि वे विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का तीन महीने में अनुपालन करें।

मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि 2006 के उच्चतम न्यायालय के उस आदेश का अधिकारियों द्वारा अभी तक क्रियान्वयन नहीं किया गया है, जिसमें सभी विवाहों को अनिवार्य रूप से पंजीकृत करने को कहा गया था।

इसमें कहा गया, ‘‘यह वास्तव में अनुचित है। यह चौंकाने वाला है कि आपने उच्चतम न्यायालय के आदेश को लागू कैसे नहीं किया।’’

उच्च न्यायालय ने विवाह पंजीकरण के केंद्रीकृत डेटाबेस के लिए नियम तैयार करने के वास्ते गृह मंत्रालय को निर्देश देने के अनुरोध संबंधी याचिका पर दोनों सरकारों को नोटिस भी जारी किया।

फरवरी 2006 में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया था कि सभी विवाहों को, चाहे वे किसी भी धर्म के तहत किये गए हों, अनिवार्य रूप से पंजीकृत किया जाना चाहिए तथा केंद्र और सभी राज्यों को तीन महीने के भीतर इसके लिए नियम बनाने और अधिसूचित करने का निर्देश दिया था।

शीर्ष अदालत के निर्देशों के तहत, दिल्ली सरकार ने 21 अप्रैल 2014 को एक आदेश जारी किया जिसमें विवाहों के अनिवार्य पंजीकरण के लिए कुछ प्रावधान शामिल थे। आदेश को "दिल्ली (विवाह का अनिवार्य पंजीकरण) आदेश, 2014" के नाम से जाना जाता है।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने नियमों में विभिन्न कमियों और खामियों का उल्लेख किया और कहा कि राज्य और केंद्र सरकार को इसके बारे में सूचित किया गया है।

याचिकाकर्ता आकाश गोयल ने कहा कि 2006 के फैसले में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपेक्षित उचित कानून के अभाव में, विवाह पंजीकरण के लिए उपलब्ध तंत्र न केवल अपर्याप्त है और पंजीकरण चाहने वाले लोगों के लिए कठिनाई पैदा करता है, बल्कि यह विवाह के अनिवार्य पंजीकरण के उद्देश्य को भी पूरा नहीं करता है।

पीठ ने कहा, ‘‘हम भारत सरकार के संबंधित मंत्रालय और दिल्ली सरकार से आग्रह करते हैं कि वे इस मामले पर गौर करें और उचित कदम उठाएं, जो कानून के तहत जरूरी होगा और यह भी सुनिश्चित करें कि उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों का अनुपालन हो।’’

पीठ ने तीन महीने का समय दिया और कहा कि उसके आदेश के संदर्भ में केंद्र और राज्य सरकार के निर्णय नौ जुलाई को अगली सुनवाई से पहले दाखिल किए जाने चाहिए।

जब दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि उसने उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप नियम बनाए हैं, तो पीठ ने कहा कि नियम केवल कार्यकारी प्रकृति के हैं। उसने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार एक अधिनियम होना चाहिए...आपको लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विवाह के पंजीकरण के लिए नियम बनाने होंगे। यही समय की मांग है। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जो अदालत में आनी चाहिए।’’

याचिका में गृह मंत्रालय को विवाह के केंद्रीकृत डेटाबेस के लिए नियम तैयार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था क्योंकि "राज्यव्यापी अलग-अलग डेटाबेस" उच्चतम न्यायालय के फैसले के उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद नहीं करते क्योंकि कोई व्यक्ति किसी भी राज्य में पहले से ही विवाहित होने और पंजीकरण कराये होने के बावजूद दिल्ली में भी आसानी से विवाह कर सकता है और पंजीकरण करा सकता है।

याचिका में दिल्ली अनिवार्य विवाह पंजीकरण आदेश, 2014 के कुछ खंडों को संशोधित करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था, ताकि विवाहित जोड़े और गवाह संबंधित अधिकारियों के समक्ष डिजिटल तरीके से पेश होकर विवाह का ऑनलाइन पंजीकरण करा सकें।

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