नयी दिल्ली, 16 नवंबर मद्रास उच्च न्यायालय की न्यायाधीश के रूप में अधिवक्ता लक्ष्मण चंद्रा विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति संबंधी कॉलेजियम के फैसले का बचाव करते हुए, प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा है कि किसी को केवल पूर्व में दिये गये उनके विचारों के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए।
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के समक्ष केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाली वकील को पदोन्नत करने का प्रस्ताव उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े होने के आरोपों के बाद विवादों में घिर गया है।
उच्च न्यायालय के कुछ बार सदस्यों ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर गौरी को अदालत की अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश को वापस लेने का अनुरोध किया था और आरोप लगाया था कि उन्होंने ईसाइयों और मुसलमानों के खिलाफ घृणास्पद टिप्पणियां की थी।
प्रधान न्यायाधीश ने कानूनी पेशे पर हार्वर्ड लॉ स्कूल सेंटर में कहा कि उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने न्यायाधीश के कथित भाषण की प्रकृति पर ‘‘बहुत ध्यान से‘‘ गौर किया और केंद्र सहित सभी हितधारकों के साथ जानकारी को साझा किया गया।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने इसे बहुत ध्यान से देखा। न्यायाधीश द्वारा कथित तौर पर दिए गए भाषण की प्रकृति पर बहुत ध्यान से गौर किया गया। जिन प्रक्रियाओं का हम पालन करते हैं उनमें से एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगना है और हम जानकारी मांगते हैं और जानकारी को सरकार के साथ साझा करते हैं।’’
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया एक काफी जटिल प्रक्रिया है जिसमें संघीय प्रणाली की विभिन्न इकाइयां - राज्य और खुफिया ब्यूरो जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियां शामिल होती हैं। यह एक व्यापक आधार वाली सहयोगात्मक प्रक्रिया है जिसमें किसी एक पक्ष की निर्णायक भूमिका नहीं होती है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि जो वकील विभिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे अद्भुत न्यायाधीश बनते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारे सबसे महान न्यायाधीशों में से एक, न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर, जिन्होंने कुछ बेहतरीन फैसले दिए, उनकी पृष्ठभूमि राजनीतिक थी। मेरा अपना अनुभव यह रहा है कि विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले विभिन्न वर्गों की तरफ से पेश होने वाले न्यायाधीश अद्भुत न्यायाधीश साबित हुए हैं।’’
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि न्याय करने के हमारे पेशे में कुछ ऐसा है जो एक बार न्यायिक पद ग्रहण करने के बाद आपको निष्पक्ष बना देता है।’’
उच्चतम न्यायालय ने अधिवक्ता लक्ष्मण चंद्र विक्टोरिया गौरी को मद्रास उच्च न्यायालय की अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ लेने से रोकने के अनुरोध संबंधी एक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था। साथ ही, कहा था कि नियुक्ति के लिए कॉलेजियम द्वारा उनके नाम की सिफारिश किये जाने से पहले ‘परामर्श लेने’ की प्रक्रिया हुई थी।
उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि गौरी को अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया है और यदि वह इस शपथ के प्रति ईमानदार नहीं रहती हैं और इसके मुताबिक अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करती हैं, तो उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम उस पर विचार करेगा।
न्यायालय ने इस बात का जिक्र किया था कि ऐसे उदाहरण रहे हैं, जिनमें लोगों (अतिरिक्त न्यायाधीशों) को स्थायी न्यायाधीश नहीं बनाया गया है।
गौरी की नियुक्ति के खिलाफ दो याचिकाओं को शीर्ष न्यायालय द्वारा खारिज किये जाने से कुछ ही मिनट पहले, उन्हें मद्रास उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने सात फरवरी को अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में पद की शपथ दिलाई थी।
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