देश की खबरें | चित्रकारों के सामने फर्जीवाड़ा, पाइरेसी जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं परेशानी का सबब

नयी दिल्ली, चार जुलाई भारतीय कला की मांग भले ही बढ़ रही है लेकिन फर्जीवाड़ा, पाइरेसी एवं रॉयल्टी नहीं मिलने जैसी चुनौतियां चित्रकारों के लिये लगातार परेशानी का सबब बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि एम एफ हुसैन, एस एच रजा और मंजीत बावा जैसे प्रसिद्ध चित्रकारों की कलाकृतियों की सबसे अधिक नकल की जाती है और अक्सर उनके ऊंचे दाम भी मिल जाते हैं तथा उसका कारण बड़ी चतुराई से नकल करना और ऐसी फर्जी चित्रकारियों की उपलब्धता है ।

नकली चित्रकारी साठगांठ इतनी गहरी है कि कला विशेषज्ञ भी धोखा खा जाते हैं एवं संग्राहक को शक भी नहीं हो पाता है जबकि ये अपने क्षेत्र के माहिर होते हैं। भारत समेत दुनिया भर में कई मौकों पर प्रदर्शनियों एवं नीलामियों में फर्जीवाड़ा की निंदा की गयी है ।

विशेषज्ञों का कहना है कि लेकिन किस्मत हमेशा साथ नहीं देती और ऐसे परिदृश्य में उन्नत प्रौद्योगिकी की जरूरत होगी, जो न केवल जटिल कला सत्यापन प्रक्रिया को आसान बनाएगी बल्कि वह स्वचालित भी हो जाएगी।

कलेक्शन म्यूजियम इनिशिएटिव्स, द सवारा फाउंडेशन फॉर आर्ट्स की निदेशक श्रुति आइजैक के अनुसार आधुनिक भारतीय कला के संग्रहण के दौरान संग्राहक को पहले संबंधित कलाकृति के सही होने का मूल्यांकन चित्रकार की पिछली कलाकृतियों के अध्येता के आधार करनी चाहिए, जिससे संग्राहक कलाकार की शैली एवं सामग्री के साथ काम करने के तौर तरीके को जान पाएगा।

आइजैक इस बात पर सहमत हैं, ‘‘ भारतीय कला में नकली और झूठी चीजों का मूल्यांकन करना चुनौतीभरा है । ’’ उनके अनुसार अनुभव ही उनके लिए सबसे बड़ा अध्यापक है जिसने उन्हें ‘ऐतिहासिक दस्तावेज, आंकडे एवं वैज्ञानिक परख पर भरोसा करना सिखाया गया है।

हर कलाकृति की अनोखी पहचान की रक्षा करने और उसकी प्रतिकृति न बने, इसे सुनिश्चित करने के लिए भारतीय कला प्रौद्योगिकी संगठन जुंबिश जेडीएटी लेकर सामने आया, जिसका आधार भौतिक कलाकृतियों के लिए माइक्रोचिप है ।

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