देश की खबरें | केंद्र को उत्तर भारत में प्रदूषण को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभानी चाहिए: सिसोदिया
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को केंद्र से उत्तर भारत में प्रदूषण को नियंत्रित करने और पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए ‘अहम भूमिका’ निभाने की अपील की।
नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने मंगलवार को केंद्र से उत्तर भारत में प्रदूषण को नियंत्रित करने और पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए ‘अहम भूमिका’ निभाने की अपील की।
राष्ट्रीय राजधानी में इस मौसम में पहली बार वायु की गुणवत्ता सुबह को ‘बहुत खराब’ थी क्योंकि धीमी हवा एवं निम्न तापमान के चलते प्रदूषक जमा हो रहे हैं।
सिसोदिया ने पत्रकारों से कहा, ‘‘पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना शुरू हो गया है और धुआं दिल्ली पहुंचने लगा है। दिल्ली सरकार ने सालभर प्रदूषण घटाने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन ऐसा क्यों है कि जब पराली जलाये जाने लगे तभी अचानक सभी प्रदूषण को लेकर चिंतित हो गये और सालभर इस विषय पर कुछ किया ही नहीं गया।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ हम बार-बार कहते हैं कि प्रदूषण से बस दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरा उत्तर भारत प्रभावित होता है।’’
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उपमुख्यमंत्री ने कहा कि जब पराली के जलने का धुआं दिल्ली पहुंचता है तो उसकी ‘तीव्रता कुछ घट जाती है, लेकिन कल्पना कीजिए कि पंजाब और हरियाणा में रह रहे लोगों को यह कितनी बुरी तरह प्रभावित कर रहा होगा जहां वाकई पराली जलाया जाता है।’’
पराली जलाये जाने से वायु प्रदूषण बहुत बढ़ जाता है और पंजाब एवं हरियाणा समेत विभिन्न राज्यों की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कठोर उपायों को लागू करने तथा किसानों को फसल के अवशेषों को खत्म करने के लिए मशीन देने जैसे कई कदम उठाये हैं।
सिसोदिया ने कहा कि केंद्र को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने ‘केंद्र सरकार से उत्तर भारत में प्रदूषण को नियंत्रित करने और पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए ‘अहम भूमिका’ निभाने की अपील की।
इससे पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि राज्य सरकारों को एक-दूसरे पर दोषारोपण करने के बजाय मिलकर पराली जलाने के मुद्दे का हल ढूंढना चाहिए, जो दिल्ली एवं एनसीआर में सर्दियों के दिनों में सालाना मुश्किल का एक बड़ा कारण है।
उन्होंने कहा कि पड़ोसी राज्यों एवं दिल्ली के लोग पराली जलाने का दंश झेल रहे हैं जबकि ‘‘सरकारों ने अपनी आंखें बंद कर ली हैं।’’
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