देश की खबरें | ‘ईआईए के मसौदा को सभी भाषाओं में तैयार करने पर अदालत के रूख को आक्रामक तौर से न ले केंद्र’

नयी दिल्ली, 25 फरवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) के मसौदे को संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित सभी 22 ओं में अनुवाद कराने के उसके विचार को केंद्र सरकार द्वारा ‘‘आक्रमक’’ रूप से नहीं लिया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि सुदूर क्षेत्रों के लोग ‘‘हमारे नागरिक’’ हैं जिनकी बात सुनी जानी चाहिए और अगर मसौदे को केवल अंग्रेजी एवं हिंदी में प्रकाशित किया जाता है तो वे इसे नहीं समझ पाएंगे।

मुख्य न्यायाधीश डी. एन. पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की विशेष पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय से कहा, ‘‘अदालत के विचार को केंद्र सरकार द्वारा इतने आक्रामक रूप से नहीं लिया जाना चाहिए।’’

पीठ ने मंत्रालय से कहा, ‘‘आप इसका इतना कड़ा विरोध क्यों कर रहे हैं।’’ पीठ ने पूछा कि अगर अपने ही नागरिकों से सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं तो सरकार को क्या समस्या है।

अदालत ने कहा कि अगर मसौदा ईआईए को केवल अंग्रेजी एवं हिंदी में प्रकाशित किया जाता है तो देश के सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोग इसकी विषय वस्तु नहीं समझ पाएंगे।

पीठ ने कहा, ‘‘वे (सुदूर क्षेत्रों के लोग) हमारे नागरिक हैं। उन्हें भी सुना जाना चाहिए।’’

इसने कहा कि वैधानिक योजनाएं एवं सुशासन के सिद्धांत के मुताबिक विचार-विमर्श की प्रक्रिया में हर किसी को शामिल किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि सरकार के लिए मसौदा ईआईए को सभी ओं में प्रकाशित कराना आसान होगा।

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