देश की खबरें | जबरन धर्म परिवर्तन पर कानून बनाने के लिए सरकार को निर्देश नहीं दे सकते: दिल्ली उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार को कानून बनाने का निर्देश देने से सोमवार को इनकार कर दिया।

नयी दिल्ली, 25 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए केंद्र और दिल्ली सरकार को कानून बनाने का निर्देश देने से सोमवार को इनकार कर दिया।

उच्च न्यायालय ने कहा कि केंद्र अथवा कोई भी राज्य सरकार बिना किसी न्यायिक सिफारिश के ऐसे कानून बनाने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।

अदालत ने याचिकाकर्ता से जबरन धर्मांतरण के बारे में अपनी दलील को पुष्ट करने के लिए सबूत और आंकड़े पेश करने को कहा। न्यायालय ने कहा कि वह केवल याचिकाकर्ता द्वारा रिकॉर्ड में रखी गई समाचार रिपोर्ट के आधार पर इस मुद्दे का संज्ञान नहीं ले सकता।

उच्च न्यायालय ने कहा कि वह सरकार को ऐसा कानून बनाने के लिए सिफारिश कर सकता है लेकिन इसके लिए याचिकाकर्ता को पहले प्रथम दृष्टया मामला बनाना होगा।

न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, ‘‘आपकी याचिका में जबरन धर्म परिवर्तन का एक भी उदाहरण नहीं दिया गया है। अगर सरकार इस मुद्दे के बारे में जागरूक है, तो वह कानून बना सकती है। यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में है। सरकार को कानून बनाने से कौन रोक रहा है? यदि वे आपके जैसे विचार रखते हैं, तो कोई भी उन्हें कानून बनाने से नहीं रोक रहा है। उन्हें इसके लिए अदालत की स्वीकृति या सिफारिश की आवश्यकता नहीं है।"

उच्च न्यायालय अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें केंद्र और दिल्ली सरकार को धमकी, छल से उपहार और आर्थिक लाभ की पेशकश के अलावा काले जादू और अंधविश्वास के जरिए धर्मांतरण पर रोक लगाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था।

याचिका में कहा गया था कि छल-कपट अथवा किसी अन्य तरीके से धर्म परिवर्तन कराना न केवल संविधान के अनुच्छेद-14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन है, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ भी है, जो संविधान की मूल संरचना का एक अभिन्न अंग है।

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