बाइडन सीनेटर के रूप में अपने 36 साल के करियर के दौरान जिस माहौल से काफी अच्छी तरह से परिचित थे, वह शायद हमेशा के लिए खत्म हो गया है। चुनाव परिणामों ने उन्हें अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए मजबूती नहीं दी है। उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के अच्छा प्रदर्शन नही होने के कारण उनका कांग्रेस पर नियंत्रण नहीं होगा।
इस स्थिति में बाइडन के पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं होंगे। इसके अलावा अगर वामपंथ और दक्षिणपंथी ताकतें साथ-साथ चलने से इनकार करती हैं तो इससे परेशानी पैदा हो सकती है।
सीनेट में बहुमत दल के नेता मिच मैककोनेल के पूर्व सहयोगी रोहित कुमार ने कहा, "द्विदलीय स्थिति के लिए निश्चित रूप से एक अवसर है, लेकिन यह सब मध्य में होने वाला है।"
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं मालूम कि क्या (डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन) पार्टियां उन्हें ऐसा करने की अनुमति देंगी क्योंकि पार्टियों का बहुत अधिक ध्रुवीकरण हो गया है।"
यह भी पढ़े | ट्रंप की खुफिया टीम की मदद के बिना बाइडन आगे बढ़े.
हालांकि यह अभी तय नहीं है लेकिन आधुनिक दौर में बाइडन पहले राष्ट्रपति होंगे जिनकी पार्टी का कांग्रेस पर नियंत्रण नहीं होगा। ऐसा अनुमान है कि रिपब्लिकन पार्टी का सीनेट में नियंत्रण कायम रह सकता है।
सीनेट पर रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण से बाइडन को अपनी महत्वाकांक्षाओं में कमी लानी होगी और जलवायु परिवर्तन, आप्रवासन और "ओबामा केयर" जैसे बड़े मुद्दों क हल में देरी होगी।
एपी
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY