जरुरी जानकारी | नये कोयला बिजलीघरों से बचने को बैटरी भंडारण लागत में कमी लाने की जरूरत: रिपोर्ट

नयी दिल्ली, 20 अगस्त भारत में बैटरी भंडारण प्रणाली की लागत में सालाना 15 प्रतिशत की कमी लाने की जरूरत है। इससे देश में नये कोयला बिजलीघर लगाने की योजना टल सकती है और योजना के अनुसार 2032 तक कोयला क्षमता को सीमित किया जा सकता है। एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।

देश में कुल बिजली उत्पादन में कोयला आधारित बिजलीघरों की हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत है। हालांकि, 2070 तक शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को कोयले पर अपनी निर्भरता कम करने और सौर तथा पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय-ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ाने की जरूरत है।

रिपोर्ट के अनुसार, समस्या यह है कि सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र केवल तभी बिजली पैदा करते हैं जब सूरज की रोशनी हो या हवा चल रही हो। ऐसे में कम उत्पादन के समय इसके उपयोग के लिए ऊर्जा-भंडारण प्रणालियों की आवश्यकता है।

वैश्विक ऊर्जा शोध संस्थान एम्बर और दिल्ली स्थित द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट (टेरी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (बीईएसएस) की लागत में मौजूदा सात प्रतिशत की सालाना दर से गिरावट जारी रहेगी, तो बिजली क्षेत्र में 2032 तक कोयला आधारित उत्पादन ऊंचे स्तर पर जाने के बाद स्थिर हो जाएगा। जबकि गैर-सौर घंटों के दौरान मांग को पूरा करने के लिए अतिरिक्त कोयला क्षमता की आवश्यकता हो सकती है।

इसका मुख्य कारण यह है कि एक बार बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, भंडारण में सुस्त वृद्धि निरंतर नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार में बाधा बनेगी। वर्तमान में, भारत के कुल बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग सात प्रतिशत है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘और अगर बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (बीएसईएस) की लागत में हर साल औसतन 15 प्रतिशत की गिरावट आती है तो यह भारत को 2032 तक अपनी कोयला क्षमता को 260 गीगावाट के अनुमान तक सीमित करने में मददगार होगा जो 14वीं राष्ट्रीय बिजली योजना के अनुसार है।’’

इसमें यह भी कहा गया है कि यदि बैटरी की लागत में तेजी से गिरावट आती है, तो बिजली क्षेत्र नवीकरणीय ऊर्जा पर अधिक भरोसा कर सकता है और 2032 तक दिन के दौरान बिजली की 83 प्रतिशत मांग को पूरा कर सकता है। हालांकि, गैर-सौर घंटों के दौरान, नवीकरणीय ऊर्जा केवल 38 प्रतिशत मांग को पूरा कर सकती है। इसका कारण मौजूदा भंडारण सीमाएं हैं।

टेरी में बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा मामलों के वरिष्ठ निदेशक ए के सक्सेना ने कहा, ‘‘ऊर्जा भंडारण बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भंडारण विकल्पों की लागत में कमी से अर्थव्यवस्थाओं में नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में तेजी आएगी’’

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त लागत को छोड़कर, यदि बीईएसएस की लागत लगभग 60 लाख रुपये प्रति मेगावाट-घंटे (एमडब्ल्यूएच) तक आ जाती है, तो किसी नये कोयला बिजलीघर की आवश्यकता नहीं होगी।

एम्बर में बिजली नीति विश्लेषक नेशविन रोड्रिग्स ने कहा, ‘‘नीति-निर्माताओं को अब सौर ऊर्जा उत्पादन को गैर-सौर घंटों में स्थानांतरित करने की रणनीतियों पर विचार करने की जरूरत है। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में बदलाव की गति धीमी न हो। इसीलिए, बैटरी-भंडारण लागत में कमी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ ही सालाना आधार पर नवीकरणीय-ऊर्जा क्षमता में वृद्धि और आवश्यक वित्तपोषण भी जरूरी है...।’’

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