देश की खबरें | उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों पर विचार करने के लोकपाल के आदेश पर रोक

नयी दिल्ली, 20 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों पर विचार करने संबंधी लोकपाल के आदेश पर बृहस्पतिवार को रोक लगाते हुए इसे ‘‘अत्यधिक परेशान करने वाला’’ और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला आदेश करार दिया।

न्यायमूर्ति बी.आर. गवई की अगुवाई वाली विशेष पीठ ने नोटिस जारी कर केंद्र, लोकपाल रजिस्ट्रार और उच्च न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति से जवाब मांगा है।

इस पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति अभय एस. ओका भी शामिल थे।

पीठ ने कहा, ‘‘भारत संघ, रजिस्ट्रार, भारत के लोकपाल और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया जाता है, जिसका जवाब 18 मार्च को सुबह 10.30 बजे दिया जाए।’’

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के दायरे में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश कभी नहीं आते।

पीठ ने शिकायतकर्ता को न्यायाधीश का नाम उजागर करने से रोक दिया है। उसने शिकायतकर्ता को उसकी शिकायत गोपनीय रखने का भी निर्देश दिया।

लोकपाल द्वारा 27 जनवरी को पारित आदेश पर उच्चतम न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर कार्यवाही शुरू की है।

पीठ ने संबंधित रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखें तथा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (न्यायिक) के माध्यम से उसके आवास पर नोटिस तामील कराएं।

इसने कहा, ‘‘इस बीच भारत के लोकपाल द्वारा पारित 27 जनवरी, 2025 के आदेश पर रोक रहेगी...।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘हम शिकायतकर्ता को उस न्यायाधीश का नाम उजागर करने से रोकते हैं, जिसके खिलाफ उसने शिकायत दर्ज कराई है। शिकायतकर्ता को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह शिकायत को पूरी तरह गोपनीय रखे।’’

विशेष पीठ ने जैसी ही सुनवाई शुरू की, न्यायमूर्ति गवई ने मेहता से कहा, ‘‘हम भारत संघ को नोटिस जारी करने का प्रस्ताव रखते हैं।’’

मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि वह इस मामले से निपटने में पीठ की सहायता करना चाहेंगे।

न्यायमूर्ति गवई ने टिप्पणी की, ‘‘यह अत्यधिक परेशान करने वाला (आदेश) है।’’

सिब्बल ने लोकपाल के आदेश पर रोक लगाए जाने का अनुरोध करते हुए कहा कि यह खतरे से भरा है।

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि एक कानून बनाया जाना चाहिए।’’

पीठ ने कहा कि सिब्बल और एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता ने न्यायालय की सहायता करने की पेशकश की थी ‘‘क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता से संबंधित बहुत महत्वपूर्ण मामला है।’’

लोकपाल ने उच्च न्यायालय के एक वर्तमान अतिरिक्त न्यायाधीश के विरुद्ध दायर दो शिकायतों पर यह आदेश पारित किया था। इन शिकायतों में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक निजी कंपनी द्वारा शिकायकर्ता के खिलाफ दायर मुकदमे की सुनवाई कर रहे उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश को और राज्य के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश को उस कंपनी के पक्ष में प्रभावित किया।

यह आरोप लगाया गया है कि निजी कंपनी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की उस समय मुवक्किल थी, जब वह (न्यायाधीश) वकालत करते थे।

लोकपाल ने अपने आदेश में निर्देश दिया था कि इन दोनों मामलों में रजिस्ट्री में प्राप्त विषयगत शिकायतें और संबद्ध सामग्री भारत के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को उनके विचारार्थ भेजी जाए।

न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर की अध्यक्षता वाली लोकपाल पीठ ने 27 जनवरी को कहा था, ‘‘हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस आदेश के जरिए हमने इस मुद्दे पर अंतिम रूप से निर्णय कर दिया है कि क्या संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 2013 के अधिनियम की धारा 14 के दायरे में आते हैं। हां। न ज्यादा न कम। इसमें हमने आरोपों के गुण-दोष पर बिल्कुल भी गौर नहीं किया है।’’

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