देश की खबरें | महामारी के दौरान जमानत, पैरोल कैदियों के लिये अधिकार का विषय नहीं: बंबई उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. बंबई उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि कैदियों को आपात पैरोल तथा जमानत पर सिर्फ इसलिए रिहा किया जा रहा है कि उच्चतम न्यायालय को यह लगा कि कोविड-19 महामारी के बीच जेलों में भीड़ कम करने की जरूरत है। अदालत ने कहा कि इसे कैदियों के लिये अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

मुंबई, 21 जुलाई बंबई उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि कैदियों को आपात पैरोल तथा जमानत पर सिर्फ इसलिए रिहा किया जा रहा है कि उच्चतम न्यायालय को यह लगा कि कोविड-19 महामारी के बीच जेलों में भीड़ कम करने की जरूरत है। अदालत ने कहा कि इसे कैदियों के लिये अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति माधव जमदार की खंडपीठ ने प्रीति कार्ति प्रसाद और शहर के गैर सरकारी संगठन नेशनल अलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट की दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह बात कही।

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राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा लिये गये एक फैसले को याचिकाओं के जरिये चुनौती दी गई है। इस फैसले के तहत, विशेष विधानों के तहत या गंभीर अपराधों को लेकर दोषी करार दिये गये या मुकदमे का सामना कर रहे विचाराधीन कैदी आपात पैरोल या जमानत पर रिहा होने के योग्य नहीं हैं।

समिति ने कहा है कि ऐसे कैदियों को संबद्ध अदालतों का रुख कर जमानत का अनुरोध करना चाहिए।

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कोविड-19 महामारी शुरू होने पर देश भर की जेलों में भीड़ घटाने की अपील करते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी एक आदेश के बाद समिति का गठन किया गया था।

समिति ने कहा था कि सात साल तक की कैद की सजा वाले अपराधों में दोषी ठहराये गये कैदी या मुकदमे का सामना कर रहे विचाराधीन कैदी आपात या अस्थायी पैरोल और जमानत पर रिहा किये जाने के योग्य हैं।

याचिकाओं में कहा गया है कि समिति का फैसला भेदभावपूर्ण है और कैदियों का इस तरह का वर्गीकरण उनके मूल अधिकारों के हनन के समान है।

पीठ ने मंगलवार को कहा कि यदि समिति ने इस सिलिसले में फैसला किया है तो अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए क्योंकि यह मूल अधिकारों का हनन नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने हाल ही में कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे गये उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी विकास दुबे का उदाहरण दिया और कहा कि उसे पैरोल पर रिहा किया गया था।

उन्होंने कहा, ‘‘प्रधान न्यायाधीश ने सेामवार को इस बात का जिक्र किया कि इस तरह के कैदी को पैरोल देना संस्थान की नाकामी है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘महज इसलिए कि शीर्ष न्यायालय ने जेलों में भीड़ कम करने का आदेश दिया है, इसका मतलब यह नहीं है कि किसी कैदी को जमानत या पैरोल पर रिहा होने का अधिकार मिल गया है। ऐसा कोई अधिकार नहीं है। पूरा विषय उच्चाधिकार प्राप्त समिति के विवेकाधिकार पर छोड़ दिया गया है। ’’

अदालत ने कहा, ‘‘यदि समिति ने यह कहा होता कि किसी खास जाति, समुदाय या रूप रंग के कैदी को रिहा किया जा सकता है, तो हां मूल अधिकारों का हनन हुआ होता। लेकिन अभी ऐसा कोई हनन नहीं हुआ है।’’

एनजीओ की ओर से पेश हुए वकील एस बी तालेकर ने कहा कि विकास दुबे का मामला यहां उदाहरण के रूप में नहीं लिया जा सकता और उच्च न्यायालय को इस तथ्य पर भी विचार करने की जरूरत है कि महाराष्ट्र की जेलों में अत्यधिक भीड़ है।

इस पर, अदालत ने कहा कि एक संतुलित रुख रखना होगा और इसलिए समिति ने निर्णय किया कि अदालतें विशेष विधानों के तहत या गंभीर अपराधों को लेकर दोषी करार दिये गये कैदियों की जमान याचिका पर फैसला करेगी।

बहरहाल, अदालत ने दोनों याचिकाओं की सुनवाई शुक्रवार के लिये स्थगित कर दी।

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