नयी दिल्ली, 17 फरवरी उत्तर प्रदेश सरकार ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि वह राज्य के नौकरशाहों के जीवनसाथियों या परिवार के सदस्यों को सहकारी समितियों और ट्रस्टों में पदेन पद प्रदान करने की औपनिवेशिक मानसिकता को खत्म करने के लिए कानूनों में संशोधन कर रही है।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ को बताया कि इन सहकारी समितियों, समितियों और ट्रस्टों को विनियमित करने के लिए मॉडल नियम बनाए जा रहे हैं, जो राज्य से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धन प्राप्त कर रहे हैं।
उन्होंने पीठ से कहा, ‘‘हम औपनिवेशिक मानसिकता को खत्म कर रहे हैं, जहां नौकरशाहों की पत्नियों को इन समितियों और ट्रस्टों में पदेन पदों पर नियुक्त किया जाता है। आदर्श उपनियम प्रक्रिया में हैं।’’
शीर्ष अदालत बुलंदशहर की जिला महिला समिति के नियंत्रण से जुड़े विवाद पर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो उत्तर प्रदेश में 1957 से एक भूखंड पर काम कर रही है।
इस बीच, बुलंदशहर के एक पूर्व जिला मजिस्ट्रेट की पत्नी के वकील, जो समिति के ‘संरक्षक’ बनाए जाने के विवाद के केंद्र में थे, ने अपना नाम वापस लेने की मांग की, क्योंकि उनके पति को किसी अन्य पद पर स्थानांतरित कर दिया गया था।
पीठ ने उन्हें समिति के खातों की पुस्तकों सहित सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड वापस करने का निर्देश दिया।
उसने यह भी निर्देश दिया कि समिति का पंजीकरण, जो 7 मार्च तक समाप्त हो जाना है, रद्द नहीं किया जाएगा। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद के लिए तय की।
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