नयी दिल्ली, 11 दिसंबर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने सोमवार को कहा कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए सालाना संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य किया जाना चाहिए, जैसा कि मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा किया जाता है।
उन्होंने इसे लागू करने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन करने या एक नया कानून बनाने का सुझाव दिया।
सदन में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए भाजपा के वरिष्ठ सदस्य ने कहा कि प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों और आईएएस तथा आईपीएस अधिकारियों जैसे नौकरशाहों को सालाना अपनी संपत्ति की घोषणा करनी होती है।
उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया है कि जनता को विधानसभाओं और संसद के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संपत्ति के बारे में जानने का अधिकार है इसलिए उम्मीदवार इसकी घोषणा करते हुए एक हलफनामा भी दायर करते हैं।
निर्वाचित होने के बाद जनप्रतिनिधियों को अपनी संपत्ति का ब्योरा देना होता है।
उन्होंने कहा, ‘‘सार्वजनिक पद पर आसीन और सरकारी खजाने से वेतन ले रहे किसी भी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से अपनी संपत्तियों का वार्षिक ब्योरा घोषित करना चाहिए, भले ही वह किसी भी पद पर हो।’’
भाजपा सदस्य ने सुझाव दिया कि सरकार को या तो मौजूदा कानून में संशोधन करना चाहिए या उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के लिए अपनी संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य बनाने के लिए एक नया कानून बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक मतदाता के रूप में जिस प्रकार किसी विधायक या सांसद की संपत्ति का विवरण जानने का अधिकार है, वादी को भी उसी प्रकार न्यायाधीशों की संपत्ति जानने का अधिकार है।
उन्होंने कहा कि इससे न्यायिक प्रणाली में वादी का विश्वास फिर से पैदा होगा।
उन्होंने कहा कि मई 1997 में उच्चतम न्यायालय की पूर्ण पीठ ने फैसला किया था कि सभी न्यायाधीश अनिवार्य रूप से अपनी संपत्तियों की घोषणा करेंगे। लेकिन बाद में एक पूर्ण पीठ ने इसे स्वैच्छिक बना दिया।
सुशील मोदी ने कहा कि उन्होंने सुबह उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट देखी और पाया कि संपत्ति घोषणा अनुभाग को 2018 से अपडेट नहीं किया गया है क्योंकि संपत्ति की घोषणा स्वैच्छिक कर दी गई है।
भाजपा सदस्य ने कहा कि केवल पांच उच्च न्यायालयों ने ऐसी जानकारी प्रदान की है, और वह भी केवल कुछ न्यायाधीशों के बारे में।
इस बीच, तृणमूल कांग्रेस के अबीर रंजन बिस्वास ने महिलाओं के खिलाफ अपराध के बढ़ते मामलों से निपटने की जरूरत पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4.45 लाख से अधिक मामले हुए।
उन्होंने कहा कि इसका मतलब है कि हर घंटे 51 प्राथमिकी दर्ज की जाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘... महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि हो गई है। अधिकारियों के लिए यह जरूरी है कि वे इस पर ध्यान दें और पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मजबूत उपायों को लागू करें।’’
तृणमूल कांग्रेस के सदस्य ने आगे कहा कि जब आंकड़े लिंग आधारित अपराधों से निपटने के लिए व्यापक रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
उन्होंने सदन को बताया कि कोलकाता को देश के सबसे सुरक्षित शहर के रूप में शुमार किया गया है।
उन्होंने कहा कि यह महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने में स्थानीय पहल और कानून प्रवर्तन संबंधी प्रयासों के महत्व को दर्शाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए देश भर में महिलाओं की सुरक्षा को और बढ़ाने के लिए, नीति-निर्माताओं के लिए कोलकाता जैसे सफल मॉडल का विश्लेषण करना चाहिए और पूरे देश में उपलब्ध सर्वोत्तम प्रथाओं को दोहराना महत्वपूर्ण है।’’
बिस्वास ने सुझाव दिया कि इसमें पुलिस की उपस्थिति में वृद्धि, सामुदायिक कार्यक्रम और ऐसी घटनाओं पर तेजी से प्रतिक्रिया के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना शामिल हो सकता है।
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