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विदेशियों को मंगलवार तक दक्षिण अफ्रीका छोड़ने का अल्टीमेटम

क्या शासन, प्रशासन की नाकामी और सदाबहार भ्रष्टाचार समाज में घृणा को बढ़ावा देते हैं? दक्षिण अफ्रीका के हालात काफी हद तक इसी ओर इशारा कर रहे हैं.

विदेशियों को मंगलवार तक दक्षिण अफ्रीका छोड़ने का अल्टीमेटम
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

क्या शासन, प्रशासन की नाकामी और सदाबहार भ्रष्टाचार समाज में घृणा को बढ़ावा देते हैं? दक्षिण अफ्रीका के हालात काफी हद तक इसी ओर इशारा कर रहे हैं.आप्रवासी-विरोधी रैलियां शुरू होने से पहले दक्षिण अफ्रीका में कई तरह की चेतावनियां गूंज रही हैं. एक चेतावनी में कहा गया है कि मंगलवार तक अवैध रूप से रह रहे विदेशी दक्षिण अफ्रीका छोड़ दें क्योंकि उसके बाद होने वाले प्रदर्शन हिंसक भी हो सकते हैं. प्रदर्शन आयोजित करने वाले संगठन 'मार्च एंड मार्च' का दावा है कि उसके प्रदर्शन शांतिपूर्ण होंगे. लेकिन सोशल मीडिया पर चेतावनियां भी शेयर की जा रही है. अफ्रीकी मूल के कई विदेशियों को धमकियां भी दी जा रही हैं.

हिंसा से बचने के लिए हजारों विदेशी अफ्रीकी, या तो अपने देश वापस लौट रहे हैं या फिर बड़े समूहों में जुट रहे हैं. 30 जून को होने वाले प्रदर्शनों से पहले देश के सभी राज्यों में सुरक्षा को हाई अलर्ट पर कर दिया गया है.

दक्षिण अफ्रीका में विदेशियों के प्रति इतनी गुस्सा क्यों?

दक्षिण अफ्रीका में विदेशियों का विरोध करने वाले संगठनों का आरोप है कि अवैध आप्रवासियों की भीड़, उनकी नौकरियां छीन रही है और पूरे सिस्टम पर दबाव डाल रही है. अवैध आप्रवासियों को ऊंची अपराध दर के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

24 जून 2026 को एंटी माइग्रेंट सिविल ग्रुप यूनाइटेड के प्रमुख मूसा हलोंग्वा ने पत्रकारों से कहा, "दक्षिण अफ्रीकी, अस्पतालों की लंबी लाइनों में खड़े रहने, अवैध आप्रवासियों की वजह से सरकारी स्कूलों में जगह पाने के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा से...विदेशी नागरिकों के साथ नौकरी को होड़ से...इस देश के युवाओं को नशीले पदार्थ बेचने वाले नाइजीरियाइयों से उकता चुके हैं."

विदेशियों के प्रति फैलती नफरत से कितने लोग सहमत?

पिछले साल हुए तीन सर्वे, दक्षिण अफ्रीका में आप्रवासियों के खिलाफ मौजूद गुस्से को दिखाते हैं. ह्यूमन साइंसेज रिसर्च काउंसिल के सर्वे के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका में विदेशी आप्रवासियों के प्रति गुस्सा, अब सबसे ऊंचे स्तर पर है. सर्वे के दौरान छह में से सिर्फ एक व्यस्क ने कहा कि वह सभी विदेशियों का स्वागत करेगा. वहीं 42 फीसदी ने कहा कि वे किसी विदेशी को नहीं चाहते हैं.

अफ्रोबैरोमीटर सर्वे के मुताबिक, 10 से 7 दक्षिण अफ्रीकी, आप्रवासियों को अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह बताते हैं. 85 फीसदी ने तो यह भी कहा कि सरकार को या तो शरणार्थियों की संख्या घटानी चाहिए या फिर शरण पर पूरी रोक लगा देनी चाहिए.

इप्सोस का सर्वे कहता है कि करीब 75 फीसदी लोग, अफ्रीका के अन्य देशों से आए आप्रवासियों पर "बिल्कुल भी भरोसा" नहीं करते हैं.

गलत तथ्यों के आधार पर अफवाह फैलाते लोग

अवैध रूप से दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले आप्रवासियों का विरोध करने के वाले संगठन कहते हैं कि उनका देश गैरकानूनी आप्रवासियों के हवाले हो गया है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इस दावे की जांच की. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में दक्षिण अफ्रीका में 31 लाख आप्रवासी थे, यानी देश की आबादी का 4.1 फीसदी हिस्सा.

अंतरराष्ट्रीय मानकों को देखें तो यह अनुपात कुछ देशों के मुकाबले बहुत कम है. यूएन का डाटा के मुताबिक, ब्रिटेन की आबादी में आप्रवासियों की संख्या 17 फीसदी, कनाडा में 22 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 30 फीसदी है. अपराधों के मामले में भी प्रदर्शनकारियों के दावे सही नहीं हैं. नौकरियां छीनने के मामले में भी ऐसे आरोप अफवाह साबित हो रहे हैं.

नाकामी सरकार और प्रशासन की, ठीकरा आप्रवासियों के सिर

एंथनी काजीबोनी, जोहानिसबर्ग यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट इन अफ्रीका में सीनियर रिसर्चर हैं. काजीबोनी के मुताबिक, यह दावा गलत है कि अवैध आप्रवासी सरकारी सेवाओं में खचाखच भीड़ पैदा कर रहे हैं. काजीबोनी कहते हैं, बिना दस्तावेजों वाले आप्रवासी, आम तौर पर सरकारी अस्पताल और स्कूलों से बचते हैं क्योंकि इनके लिए रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है. अवैध आप्रवासियों को डर लगता है कि रजिस्ट्रेशन के कारण वे पकड़े जाएंगे.

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, पूरे देश में स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं संघर्ष कर रही हैं, लेकिन इनके लिए लगातार किया गया कम निवेश और सदाबहार भ्रष्टाचार जिम्मेदार है. काजीबोनी कहते हैं, "हमें कमजोर शासन, पंगु प्रशासन और भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराना चाहिए."

काजीबोनी के मुताबिक, जैकब जुमा के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान 1.5 ट्रिलियन रैंड (91.27 अरब डॉलर) भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े. इसकी जांच करने में भी एक अरब रैंड खर्च हुए.

क्यों विदेशियों पर मढ़ा जा रहा है सारा दोष

1948 से 1990 की शुरुआत तक दक्षिण अफ्रीका पर राज करने वाली अपारथाइड सरकार ने आप्रवासियों मजदूरों का खूब इस्तेमाल किया गया. नस्लभेद व रंगभेद करने वाली 'वाइट अपारथाइड' सरकार, बड़ी संख्या में विदेशी मजदूरों के जरिए मजदूरी को सस्ता रखती थी. विदेशी मजदूरों का इस्तेमाल कर सोने की खुदाई की गई और लेबर यूनियनों को कमजोर किया गया. यह यादें दक्षिण अफ्रीका के लोगों के जेहन में अब भी हैं.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में आप्रवासन और विकास के प्रोफेसर लोरेन बी लैंडौ कहते हैं, "सेवाओं और अर्थव्यवस्था के धराशायी होने के लिए आप्रवासी किसी भी तरह जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन लोग वही याद रखते हैं जो उनकी पूर्वाग्रहों की पुष्टि करता है. वे विदेशियों को अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी निवेश करते हुए, कारोबार करते हुए या फिर कौशल देते हुए नहीं देखते हैं."

6.5 करोड़ की आबादी वाले देश में करीब एक तिहाई जनता बेरोजगार है. बेरोजगारी और असमानता के मामले में देश की गिनती सबसे पिछड़े देशों में होती है. विश्लेषक कहते हैं कि इस गुस्से को आप्रवासियों की तरफ मोड़ना सबसे आसान राजनीतिक हथकंडा है. चुनाव आते ही राजनेता इसी मुद्दे को हवा देने लगते हैं. दक्षिण अफ्रीका में 4 नवंबर 2026 में स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on Jun 29, 2026 04:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).