देश की खबरें | प्रगति की दौड़ के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण बेहद जरूरी है : सिंधिया

उज्जैन (मप्र), 29 दिसंबर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बृहस्पतिवार को कहा कि इस नए और आधुनिक समाज में प्रगति की दौड़ के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण बेहद जरूरी है।

उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान और मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'सुजलाम' के समापन के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए यह बात कही।

सिंधिया ने कहा, ‘‘हम जल संरक्षण की बात को मूल्यों से जोड़ें, अपनी जिम्मेदारी को समझें और इसे अपना धर्म माने, तभी इस संगोष्ठी की सार्थकता सिद्ध होगी। ’’

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस ‘सुजलाम’ संगोष्ठी के माध्यम से एक नई चेतना, एक नई विचारधारा एवं एक नई सोच की शुरुआत पूरे विश्व को दी जा रही और वह भी आध्यात्मिक दृष्टिकोंण के साथ।

उन्होंने कहा ,‘‘ यदि हम पंचमहाभूतों की चर्चा करें तो चाहे आकाश हो, जल हो, वायु हो, पूरे ब्रह्मांड का समावेश इस संगोष्ठी के माध्यम से दिखाई दिया। ’’

सिंधिया ने कहा, ‘‘इस धरती पर हजारों वर्षों पहले मनुष्य की उत्पत्ति हुई है और प्रकृति ने ही मनुष्य को पाला है, पोसा है और सदा प्रकृति के संरक्षण में ही मनुष्य ने अपना विकास किया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मानव ने प्रकृति पर हावी होना आरंभ कर दिया। यहीं से प्रकृति का स्वरूप बिगड़ने लगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हम यह भूल गए कि जिसने हमें जन्म दिया, उसका सम्मान यदि हम नहीं करेंगे तो मानव जाति अपना अंत करा लेगी।हम प्रकृति के किरायेदार है, मालिक नहीं।’’

सिंधिया ने कहा, ‘‘इस नए और आधुनिक समाज में प्रगति की दौड़ के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण बेहद जरूरी है।’’

उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के रूप में परिणाम साामने आ रहे हैं लेकिन प्रकृति आपको सुधरने का एक संदेश और मौका दे रही है और ऐसा लगता है ‘सुजलाम’ संगोष्ठी ने यही संदेश आमजन को दिया होगा।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने 1999 में एक रिपोर्ट दी थी जिसमें 50 देशों के वैज्ञानिकों ने आने वाले समय में पेयजल की चुनौती सबसे बड़ी चुनौती बताई थी।

सिंधिया ने कहा कि एक तरफ बढ़ती हुई जनसंख्या है, तो दूसरी ओर जलाशयों की हालत बद से बदतर होना और छोटी-छोटी नदियों का विलुप्त होना लेकिन यदि जल है तभी कल है। उन्होंने कहा कि इस पंक्ति के कई मायने हैं और विश्व भर में इस पर काम हो रहा है।

सिंधिया ने कहा, ‘‘ऋग्वेद में नदियों को मां कहा गया है। अतः हम जल का सम्मान करें। यही सीख हमें आज की संगोष्ठी देती है। ’’

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