देश की खबरें | सेवानिवृत्ति के बाद, सेना में जाने के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षण देते हैं सैन्य अधिकारी
एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

आर एस पुरा (जम्मू कश्मीर), 12 सितंबर जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट बसे इस कस्बे के एक मैदान में रोजाना दिन में दो बार सैकड़ों की संख्या में युवा सेना में भर्ती होने के लिये तैयारी के उद्देश्य से जुटते हैं। उन्हें सेना से सेवानिवृत्त 57 वर्षीय सैन्य अधिकारी सशस्त्र बलों में भर्ती होने के लिये स्वैच्छिक रूप से प्रशिक्षण देते हैं।

सुचेतगढ़ सेक्टर के सीमावर्ती गांव सत्रायन के रहने वाले कैप्टन (सेवानिवृत्त) शेर सिंह ने 2011 में स्थानीय युवकों के लिये “मिशन प्रशिक्षण” शुरू किया था। वह उसी साल सेना में 31 वर्षों की सेवा के बाद सेवा निवृत्त हुए थे।

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कोरोना वायरस की वजह से लागू लॉकडाउन के कारण चार महीनों को छोड़ दें तो सुबह और देर शाम को जम्मू जिला प्रशासन के सक्रिय सहयोग से प्रशिक्षण का कार्यक्रम सुचारू रूप से चल रहा है। सेना में भर्ती के इच्छुक अभ्यर्थी लिखित परीक्षा भी सही से उत्तीर्ण कर सकें, इसलिये एक स्कूली शिक्षक को भी इस कार्यक्रम से जोड़ा गया है।

सिंह 1980 में जम्मू कश्मीर राइफल्स में भर्ती हुए थे और पदोन्नत होकर कैप्टन के ओहदे तक पहुंचे थे। उन्होंने पीटीआई को बताया, “सीमावर्ती क्षेत्र के युवकों के लिये पहली प्राथमिकता सेना या किसी अन्य सशस्त्र बल में भर्ती होना है और मैं खुश हूं कि दर्जनों लड़कियों समेत मेरे 3600 से ज्यादा छात्र बीते नौ वर्षों में भर्ती हो चुके हैं और अपना सपना साकार कर चुके हैं।”

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सेना में अपनी लंबी सेवा के दौरान कमांडो प्रशिक्षण समेत कई तरह के पाठ्यक्रमों का अध्ययन कर चुके अनुभवी प्रशिक्षक सिंह ने कहा कि जब वह पेंशन पर वापस अपने गांव लौटे तो उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि युवा निरुद्देश्य भटक रहे हैं और उनमें से कुछ नशा भी कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “हमारे युवा बेहद प्रतिभाशाली और परिश्रमी हैं और अगर उन्हें सही प्रेरणा मिले तो वे किसी से कम नहीं हैं।” सिंह ने कहा कि उन्होंने कुछ लड़कों के साथ शुरुआत की थी और वक्त बीतने के साथ ही यह संख्या अब 1000 के भी पार हो गई है।

सिंह ने 1990 के दशक की शुरुआत में राज्य में आतंकवाद के चरम पर रहने के दौरान सीमावर्ती कुपवाड़ा जिले के तंगधार और माछिल सेक्टर में नियंत्रण रेखा पर काफी समय तैनात रहने के साथ अपनी करीब आधी नौकरी राज्य के विभिन्न हिस्सों में तैनाती के दौरान की है। इस दौरान कई बार उनका आतंकवादियों से आमना-सामना भी हुआ। सिंह ने कहा कि प्रशिक्षण देने की वजह से उनकी खुद की फिटनेस भी बरकरार है।

उन्होंने कहा, “मार्च में महामारी से पहले मैं अपने प्रशिक्षुओं के साथ 12 किलोमीटर दौड़ता था। अब जुलाई में प्रशिक्षण फिर से शुरू करने के बाद मैंने इस दूरी को घटाकर चार किलोमीटर कर लिया है।”

सिंह ने कहा कि सेना में अपने कार्यकाल के दौरान वह दौड़ को लेकर बेहद उत्साहित रहते थे और केरल में अपनी दो साल की तैनाती के दौरान उन्होंने वहां हजारों युवकों को प्रशिक्षण दिया।

सिंह ने कहा ‘‘ शुरू के पांच साल वह युवकों को सिर्फ शाम को और हफ्ते में एक दिन सुबह प्रशिक्षण दिया करते थे। लेकिन उनके जोश और बढ़ती संख्या को देखते हुए मैंने उन्हें समूहों में सुबह और शाम प्रशिक्षित करने का फैसला किया।’’

उन्होंने कहा, “एक बार 2016 में तत्कालीन उपायुक्त ने मेरे समूह को दौड़ते हुए देखा और युवकों के लिये सरकारी सहायता के साथ आगे आए। मैंने इन बच्चों को लिखित परीक्षा की तैयारी करवाने के लिये एक शिक्षक की मांग की जिसे पूरा किया गया।” उन्होंने कहा कि शिक्षक रोजाना बच्चों को एक से दो घंटे पढ़ाते हैं।

उन्होंने कहा कि वह इस प्रशिक्षण के लिये बच्चों से कोई शुल्क नहीं लेते हैं।

प्रशिक्षुओं में से एक हैप्पी सिंह को उम्मीद है कि वह सशस्त्र बलों की भर्ती परीक्षा में पास हो जाएगा।

उसने कहा, “मुझे पूरा विश्वास है की शारीरिक परीक्षा में पहला स्थान मिलेगा।”

हैप्पी ने कहा कि प्रशिक्षक के प्रयासों ने उन्हें पंजाब के युवकों में भी लोकप्रिय बना दिया है जो किराये पर घर लेकर या अपने रिश्तेदारों के यहां रहकर उनसे प्रशिक्षण ले रहे हैं।

एक अन्य प्रशिक्षु गौरव चौधरी ने कहा कि उन्हें शारीरिक और शैक्षणिक दोनों प्रशिक्षण मिल रहा है जो भर्ती अभियान में उनकी मदद करेगा।

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