जर्मनी और इस्राएल के बीच क्यों दिखने लगी है कूटनीतिक दरार

इस्राएली सेटलमेंट पॉलिसी पर जर्मन चांसलर मैर्त्स के बयान की इस्राएली वित्त मंत्री ने जो तीखी आलोचना की है, उससे दोनों के बीच दशकों पुराने अटूट रिश्तों में आती 'दूरी' का स्पष्ट संकेत मिल रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

इस्राएली सेटलमेंट पॉलिसी पर जर्मन चांसलर मैर्त्स के बयान की इस्राएली वित्त मंत्री ने जो तीखी आलोचना की है, उससे दोनों के बीच दशकों पुराने अटूट रिश्तों में आती 'दूरी' का स्पष्ट संकेत मिल रहा है.इस हफ्ते की शुरुआत में, जब जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने इस्राएली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की, तो यह दुनिया के नेताओं के बीच एक सामान्य बातचीत जैसा लगा. इसके बाद, मैर्त्स के प्रवक्ता श्टेफान कॉर्नेलिउस ने इस बातचीत के बारे में एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की. इसकी आखिरी दो पंक्तियां कुछ इस तरह थीं: "इस बातचीत में, चांसलर ने फलीस्तीनी क्षेत्रों में हो रहे घटनाक्रमों पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की. उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी तरह से वेस्ट बैंक का आंशिक विलय नहीं होना चाहिए.”

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स' पर चांसलर के अकाउंट से यही संदेश जर्मन और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में पोस्ट किया गया: "मैंने साफ तौर पर कहा है कि किसी भी तरह से वेस्ट बैंक का विलय नहीं होना चाहिए.”

यह सब कुछ नया नहीं है. उदाहरण के लिए, जुलाई 2025 के मध्य में दोनों सरकारों के प्रमुखों के बीच हुई बातचीत में, जर्मन सरकार ने बताया: "चांसलर ने जोर देकर कहा कि वेस्ट बैंक के किसी भी तरह के विलय की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए.” तब भी, जर्मन पक्ष ने यह साफ कर दिया था कि वह किसी भी एकतरफा इस्राएली कार्रवाई का कड़ा विरोध करता है.

इस्राएली और फलीस्तीनियों के लिए, जर्मनी ‘दो-राष्ट्र समाधान' का समर्थन करना जारी रखे हुए है. हालांकि, इस्राएल ने अपनी नीति के तहत, 7 अक्टूबर, 2023 के हमास आतंकवादी हमलों से बहुत पहले ही इस ‘दो-राष्ट्र समाधान' को दरकिनार कर दिया था.

इस्राएली मंत्री ने वेस्ट बैंक बस्तियों पर मैर्त्स की आलोचना की कड़ी निंदा की

इस बार जर्मनी की चेतावनी के बाद जुबानी तल्खी बढ़ गई है. इस्राएली वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने सोशल मीडिया पर मैर्त्स की तीखी आलोचना की. जर्मन नेता की पोस्ट के जवाब में, 46 वर्षीय स्मोट्रिच ने सोमवार को ‘एक्स' पर लिखा, "वो दिन अब चले गए जब जर्मन यहूदियों को यह बताते थे कि उन्हें कहां रहने की इजाजत है और कहां नहीं. वे दिन अब कभी वापस नहीं आएंगे. आप हमें फिर से यहूदी बस्तियों में रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते और अपनी ही जमीन पर तो बिल्कुल भी नहीं.”

बेजलेल स्मोट्रिच के दादा उन लोगों में शामिल थे जो होलोकॉस्ट (नाजी नरसंहार) में बच गए थे. स्मोट्रिच, नेतन्याहू सरकार के उन मंत्रियों में से हैं जो बहुत ही दक्षिणपंथी और सख्त विचारधारा वाले माने जाते हैं. उनका जन्म इस्राएल के कब्जे वाले ‘गोलन हाइट्स' में हुआ था और आज वे खुद वेस्ट बैंक के उस इलाके में रहते हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्राएल के कब्जे वाला हिस्सा माना जाता है.

स्मोट्रिच अपने बयानों की वजह से अक्सर चर्चा में रहते हैं, जिन्हें कई लोग नस्लवादी, दूसरे देशों के लोगों से नफरत करने वाला और एलजीबीटीक्यू समुदाय के खिलाफ मानते हैं. यही नहीं, वे कई बार इस्राएल की सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को मानने से साफ इनकार कर देते हैं और खुलेआम अदालत का विरोध करते हैं.

इस्राएल में इस साल अक्टूबर के आसपास चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में स्मोट्रिच चाहते हैं कि जनता उन्हें सिर्फ नेतन्याहू का साथी न समझे, बल्कि एक अलग और बड़े नेता के रूप में देखे. वे खुद को नेतन्याहू से अलग दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि अपनी अलग पहचान बना सकें.

इस्राएली वित्त मंत्री स्मोट्रिच ने अपना बयान ‘योम हाशोआ' की पूर्व संध्या पर जारी किया, जो इस्राएल में ‘होलोकॉस्ट स्मृति दिवस' के रूप में मनाया जाता है. यह वह दिन है जब पूरा देश दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी द्वारा मारे गए 60 लाख यहूदियों को याद करता है. इस दिन इस्राएल में कुछ मिनटों के लिए सब कुछ थम जाता है. लोग जहां होते हैं वहीं रुक जाते हैं और उन मासूमों की याद में प्रार्थना करते हैं जो उस नरसंहार का शिकार हुए थे.

स्मोट्रिच ने चांसलर मैर्त्स पर निशाना साधने के लिए इस खास दिन का सहारा लिया. उन्होंने नाजियों के समय की उन यहूदी बस्तियों का जिक्र किया जहां यहूदियों को कैद करके रखा जाता था. उन्होंने अपनी बात ‘अम यिसराइल चाई' कहकर खत्म की, जिसका मतलब है, ‘इस्राएल के लोग जीवित हैं.'

बर्लिन में इस्राएली राजदूत ने मैर्त्स का किया समर्थन

मंगलवार को बर्लिन में, जर्मनी में इस्राएल के राजदूत रॉन प्रोसोर ने स्मोट्रिच की बात का खंडन किया. उन्होंने इस्राएली ब्रॉडकास्टर ‘कान' के साथ एक इंटरव्यू में मैर्त्स को ‘इस्राएल का महान दोस्त' बताया. प्रोसोर ने कहा, "जर्मनों से तर्क करना मुमकिन है और पूरी तरह से जायज भी. खासकर आज के दिन, जो बहुत ही भावुक करने वाला दिन है.” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि स्मोट्रिच जैसे बयान ‘होलोकॉस्ट की यादों की अहमियत को कम करते हैं और चीजों को पूरी तरह से तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं.”

राजदूत प्रोसोर, जर्मनी में इस्राएल के खिलाफ होने वाली हर बहस में अपनी बात बहुत मजबूती से रखते हैं. हालांकि, इस बार उन्होंने स्मोट्रिच पर आरोप लगाया कि वे राजनीति चमकाने के लिए होलोकॉस्ट (यहूदी नरसंहार) के इतिहास का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं.

इस्राएली मंत्री ने चांसलर पर जो हमला बोला है, उसका संकेत करीब तीन हफ्ते पहले ही मिल गया था. मार्च के आखिर में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. उस समय इस्राएल के विदेश मंत्री गिडोन सार ने इस्राएल में जर्मनी के राजदूत श्टेफेन जाइबर्ट की ‘एक्स' पोस्ट पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया दी थी. यानी तनाव की नींव पहले ही पड़ चुकी थी.

राजदूत जाइबर्ट ने अपनी पोस्ट में कई अहम बातें लिखी थीं. उन्होंने वेस्ट बैंक के संवेदनशील हालात पर चिंता जताई थी और इस्राएली बस्ती में रह रहे लोगों द्वारा फलीस्तीनी नागरिकों पर किए जा रहे हमले का जिक्र किया था. गौर करने वाली बात यह है कि वेस्ट बैंक पर इस्राएल का कब्जा 1967 से है.

जाइबर्ट का इस्राएल में कार्यकाल इसी साल गर्मियों में समाप्त हो रहा है. वह जर्मनी की पूर्व चांसलर अंगेला मैर्केल के प्रवक्ता भी रह चुके हैं. वे आमतौर पर इस्राएल की नीतियों की आलोचना नहीं करते हैं. उनकी हालिया पोस्ट किसी कूटनीति से ज्यादा उनके दिल की आवाज लग रही थी. उन्होंने इस्राएल से इतना लगाव महसूस किया कि उन्होंने हिब्रू भाषा सीखी और हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों को छुड़ाने के लिए जी-जान से कोशिशें की.

जर्मनी और इस्राएल के बीच बढ़ रही दूरी

हाल के हफ्तों में ‘एक्स' पर जो कुछ भी देखने को मिला है वह सिर्फ सोशल मीडिया पर आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली भड़काऊ बयानबाजी का एक उदाहरण भर नहीं है, बल्कि यह जर्मनी और इस्राएल के बीच बढ़ती दूरी को भी दिखाता है. एक ऐसी दूरी जिसकी शुरुआत 7 अक्टूबर, 2023 से काफी पहले ही हो चुकी थी.

जर्मनी और इस्राएल के रिश्तों में आई हालिया कड़वाहट को समझने के लिए इतिहास के उन पन्नों को पलटना जरूरी है, जब दोनों देश एक-दूसरे के बेहद करीब थे. दोनों देशों के बीच बढ़ती दूरी का सबसे बड़ा सबूत यह है कि पिछले काफी समय से इनके बीच कोई बड़ी सरकारी बैठक नहीं हुई है.

इसकी शुरुआत 2008 में हुई थी, जब जर्मनी और इस्राएल ने पहली बार आपस में आधिकारिक चर्चा शुरू की थी. उसी वर्ष की शुरुआत में, चांसलर अंगेला मैर्केल ने इस्राएल की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस्राएली संसद ‘नेसेट' में भाषण दिया था. ऐसा करने वाली वह पहली जर्मन सरकार की प्रमुख थीं. उन्होंने यह भाषण जर्मन भाषा में दिया था.

उस समय, कुछ इस्राएली सांसद सदन से बाहर चले गए थे. तत्कालीन विपक्षी नेता नेतन्याहू ने इस बात की आलोचना की थी कि मैर्केल वहां आईं ही क्यों थीं.

इन सरकारी बैठकों का मतलब होता है कि दोनों देशों के सरकार प्रमुख, यानी प्रधानमंत्री, चांसलर और सभी प्रमुख मंत्री एक साथ बैठते हैं. इसे बहुत ही करीबी दोस्ती का संकेत माना जाता है. जर्मनी लगभग एक दर्जन देशों के साथ ही ऐसी बैठकें करता है. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जर्मनी और इस्राएल के बीच आखिरी ऐसी बैठक 2018 में हुई थी, यानी पूरे 8 साल पहले. अगर देखा जाए, तो जर्मनी ने सिर्फ रूस और तुर्की के साथ इससे ज्यादा लंबे समय तक दूरी बनाई है.

फलीस्तीन क्षेत्र: किसी इलाके के देश बनने की क्या शर्तें हैं?

फिर, अक्टूबर 2025 में चांसलर मैर्त्स ने ‘रीजन ऑफ स्टेट' शब्द से खुद को थोड़ा अलग कर लिया. इस शब्द का इस्तेमाल अंगेला मैर्केल के शुरुआती कार्यकाल 2008 से हो रहा है. इसका मतलब था कि इस्राएल की सुरक्षा करना जर्मनी की एक ‘खास राजनीतिक जिम्मेदारी' है. लेकिन मैर्त्स ने जर्मन दैनिक अखबार ‘फ्रांकफुर्टर आल्गेमाइन जोनटागत्साइटुंग' से कहा कि उन्हें इस शब्द को समझने में हमेशा मुश्किल हुई है, क्योंकि इसके असली मायने और इसके अंदर छिपी शर्तें कभी पूरी तरह साफ नहीं की गई हैं.

तब से लेकर अब तक, इस बात पर ज्यादा चर्चा होती रही है कि जर्मनी को इस्राएल के प्रति अपनी जिम्मेदारी को असल में कैसे निभाना चाहिए. इसमें गाजा युद्ध में इस्राएल के रवैये की आलोचना और इस्राएल को जर्मनी के हथियार बेचने पर बहस भी शामिल है. हालांकि, इससे अहम सैद्धांतिक सवाल पर कोई चर्चा नहीं हुई है कि क्या जर्मनी गाजा के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय शांति सेना में हिस्सा लेगा.

अंत में बात यहां आती है कि इस्राएल और जर्मनी इस बात पर तो सहमत हैं कि वे ‘दो राष्ट्र समाधान' के मुद्दे पर कभी एक साथ नहीं हो सकते. जर्मनी का विदेश मंत्रालय बार-बार यह कहता रहा है कि वेस्ट बैंक के कब्जे वाले इलाकों में इस्राएल जो नई बस्तियां बना रहा है, वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है. सीधे शब्दों में कहें तो, जर्मनी इन बस्तियों को गैरकानूनी मानता है, जबकि इस्राएल इन्हें अपना हक समझता है.

इस्राएल की सरकार ने अब साफ तौर पर कह दिया है कि वे फलीस्तीनियों को अपना अलग देश बनाने नहीं देंगे. जैसे-जैसे इस्राएल इन इलाकों में अपनी बस्तियां बढ़ाता जा रहा है, वैसे-वैसे एक अलग फलीस्तीन देश बनने की उम्मीदें खत्म होती जा रही हैं. संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि ये बस्तियां शांति के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हैं. सबसे दुखद बात यह है कि कट्टरपंथी इस्राएली लोगों द्वारा फलीस्तीनी गांवों पर किए गए हमलों में आए दिन आम फलीस्तीनी नागरिक मारे जा रहे हैं.

इसी पूरे माहौल (वेस्ट बैंक की हिंसा और बस्तियों का विस्तार) को देखते हुए चांसलर मैर्त्स ने अपनी चिंता जताई थी. लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी बात रखी, इस्राएल के वित्त मंत्री स्मोट्रिच ने उन पर तुरंत पलटवार कर दिया.

स्मोट्रिच द्वारा चांसलर मैर्त्स की आलोचना किए जाने के बाद, मशहूर ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन' ने एक विशेषज्ञ की बात छापी. यह विशेषज्ञ ‘इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप' से जुड़े हैं, जो ब्रसेल्स में स्थित एक बड़ी गैर-सरकारी संस्था है और दुनिया भर के विवादों पर नजर रखती है. उन्होंने इस पूरे मामले पर अपनी राय दी कि कैसे यह टकराव दोनों देशों के भविष्य के रिश्तों को बदल सकता है.

विशेषज्ञ मैराव जोंसजीन ने ‘एक्स' पर साफ तौर पर कहा कि इस्राएली सरकार जर्मनी पर बार-बार हमला इसलिए कर रही है, क्योंकि जर्मनी फलीस्तीनियों के बुनियादी मानवाधिकारों की बात उठा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि इस्राएली नेता ऐसा करने के लिए अपने सबसे मजबूत यूरोपीय दोस्त (जर्मनी) को भी नाराज करने को तैयार हैं. जोंसजीन ने जर्मन सरकार से नेतन्याहू सरकार के प्रति अपने रुख पर पुनर्विचार करने का भी आग्रह किया.चांसलर मैर्त्स की पहली इस्राएल यात्रा, दो-राष्ट्र समाधान भी एजेंडा में

Share Now