सेक्स वर्क को लेकर किस तरह बदला समाज का नजरिया
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मन शहर बॉन में एक नई प्रदर्शनी लगाई गई है, जो सेक्स वर्क के इतिहास और उससे जुड़ी संस्कृति को दर्शाती है. यह दिखाती है कि इस काम के लिए जो शब्द इस्तेमाल हुए, उसने समाज में इसके प्रति किस तरह से नफरत या भेदभाव पैदा की."लालुन दुनिया के सबसे पुराने पेशे की सदस्य हैं.”

अंग्रेजी लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी 1888 की कहानी ‘ऑन द सिटी वॉल' में यह ऐसी लाइन लिखी, जिसने सेक्स वर्क के लिए दुनिया का सबसे मशहूर छद्म नाम तैयार कर दिया. तब से यह मुहावरा बार-बार दोहराया जाता रहा है. सीधे तौर पर काम का नाम लेने के बजाय, इस तरह की घुमावदार भाषा उस समय के समाज की नैतिकता को दिखाती थी. तब लोग ऐसे शब्दों का इस्तेमाल इसलिए करते थे, ताकि इस विषय पर बात भी हो जाए और उन्हें शर्मिंदगी का सामना भी न करना पड़े.

बॉन के बुंडेसकुंस्टहाले (फेडरल आर्ट गैलरी) में एक नई प्रदर्शनी शुरू हुई है, जिसका नाम है ‘सेक्स वर्क: ए कल्चरल हिस्ट्री'. यह प्रदर्शनी दिखाती है कि अलग-अलग समाजों और बदलत समय के साथ सेक्स वर्क को कैसे पेश किया गया, इसके लिए क्या नियम बनाए गए और इस काम से जुड़े लोगों के अनुभव कैसे रहे. यह इतिहास के माध्यम से समाज की बदलती सोच को समझने की एक कोशिश है.

प्रदर्शनी लगाने वाले इस विषय को ‘एक ऐसा क्षेत्र बताते हैं जो नैतिकतावादी और अत्यधिक राजनीतिक चर्चाओं से भरा हुआ है.' यहां ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरानी कलाकृतियों, कानूनी कागजातों, और आज के दौर के लोगों की बातों के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई है कि समाज में सेक्स वर्क को किस तरह एक खास सांचे में ढाला गया. प्रदर्शनी यह भी उजागर करती है कि कैसे आम बहसों में इसकी हकीकत को अक्सर तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है.

यह प्रदर्शनी आपको यह नहीं बताती कि क्या सही है और क्या गलत है. इसके बजाय, यह आपको खुद से यह पूछने के लिए तैयार करती है कि आपकी अपनी सोच कैसे बनी. क्या यह मीडिया की खबरों का असर है, समाज की उम्मीदें हैं, या फिर वे शब्द हैं जो आपने बचपन से सुने हैं? यह आपकी अपनी धारणाओं को टटोलने का निमंत्रण है.

परजीवी से लेकर सेक्स वर्कर तक

प्रदर्शनी का एक हिस्सा भाषा की पड़ताल करता है. यहां एक शब्द-कोश दिया गया है जो यह दिखाता है कि इतिहास में सेक्स वर्कर्स के लिए किन-किन शब्दों का इस्तेमाल हुआ. यह इस बात की भी पड़ताल करता है कि इन शब्दों ने किन सच्चाइयों को दुनिया के सामने रखा और किन्हें हमेशा के लिए छुपा दिया. साथ ही, यह भी दिखाया गया है कि इन शब्दों ने लिंग, नैतिकता और श्रम को लेकर हमारी सोच को कैसे गढ़ा.

अर्नेस्टीन पास्टोरेलो, इस प्रदर्शनी के आयोजनकर्ताओं में से एक हैं और वह सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट भी हैं. वह कहती हैं, "सेक्स वर्क के इतिहास पर शोध करना मुश्किल है, क्योंकि हर दौर में हमें अलग-अलग नामों से पुकारा गया. ऐतिहासिक दस्तावेजों में अक्सर अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.”

वह आगे कहती हैं, "ऐतिहासिक शब्दावली अक्सर सटीक नहीं होती. 19वीं सदी में, ‘वेश्या' शब्द का इस्तेमाल किसी भी ऐसी महिला के लिए किया जा सकता था जो सार्वजनिक जगहों पर ‘बहुत ज्यादा दिखाई देती' थी, चाहे वह असल में यौन सेवाएं देती थी या नहीं.” वे समझाती हैं कि उस समय यह ‘ठप्पा' बहुत ही लापरवाही से किसी पर भी लगा दिया जाता था, चाहे वे महिलाएं गरीबी में जी रही हों, नशे की समस्या से जूझ रही हों या जिन्हें समाज ‘बिगड़ा हुआ' मानता था. इस वजह से, ऐतिहासिक शोध के लिए इन शब्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इन शब्दों के साथ इतनी बुराई और नफरत जुड़ी हुई है कि आज भी जब हम सेक्स वर्क पर बात करते हैं, तो वही पुरानी सोच हमारे आड़े आती है.

इसी तरह की गलतफहमियां दूसरे ऐतिहासिक मामलों में भी दिखती हैं. पुराने सोवियत संघ और अन्य कम्युनिस्ट देशों में सेक्स वर्कर्स पर ‘सामाजिक परजीवी' होने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया जाता था. यह शब्द शारीरिक रुप से सक्षम उन वयस्कों के लिए इस्तेमाल होता था जो ‘सामाजिक तौर पर उपयोगी कोई काम' नहीं कर रहे थे और आधिकारिक श्रम प्रणाली यानी सरकारी सिस्टम से बाहर रहकर पैसा कमा रहे थे. सेक्स वर्क को भी इसी श्रेणी में रखा गया था, क्योंकि इसे समाज के लिए उपयोगी काम नहीं माना जाता था.

इस भाषा से यह साफ पता चलता है कि अधिकारियों ने शब्दों का इस्तेमाल लोगों के व्यवहार पर लगाम लगाने के लिए किया. इन शब्दों के जरिए ही यह तय किया जाता था कि किसे एक ‘असली श्रमिक' माना जाए और किसे नहीं.

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जब हम इन सभी शब्दों को एक साथ देखते हैं, तो समझ आता है कि किसी को कोई ‘नाम' देना केवल पुकारना नहीं है, बल्कि उसके पीछे लिंग, वर्ग और समाज में उसकी हैसियत को लेकर कई धारणाएं छिपी होती हैं. कुछ नाम तो सीधे तौर पर अपमान करने के लिए बने हैं. जैसे, जर्मन भाषा का शब्द ‘स्ट्रिशर', जो मुख्य रूप से उन पुरुषों के लिए इस्तेमाल होता है जो सेक्स वर्क करते हैं. यह शब्द एक मुहावरे से निकला है जिसका मतलब होता है ‘सड़क पर ग्राहकों की तलाश में घूमना.'

1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में, इस शब्द का इस्तेमाल खासकर बर्लिन के बानहोफ जू स्टेशन के पास काम करने वाले पुरुष सेक्स वर्कर्स के लिए होने लगा. यह जगह उस समय काफी बदनाम थी. इस वजह से, ‘स्ट्रिशर' शब्द का मतलब केवल काम से नहीं रहा, बल्कि यह गरीब, बेघर, और समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों के लिए दुखद पहचान बन गया. इसने उस दौर के शहरी जीवन के एक अंधेरे पक्ष को लोगों के सामने रखा.

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आज के डिजिटल दौर में ‘पॉर्न परफॉर्मर' जैसे शब्द यह दिखाते हैं कि यह काम अब कितना बदल चुका है. सब्सक्रिप्शन वाली शुरुआती वेबसाइटों से लेकर आज के ‘ओनली-फैन्स' जैसे प्लैटफॉर्म तक, अब परफॉर्मर खुद अपना कंटेंट बनाते हैं और उसे सीधे लोगों तक पहुंचाते हैं. आज के समय में कुछ लोग खुद को 'सेक्स वर्कर' कहना पसंद करते हैं, तो कुछ इस पहचान से खुद को दूर रखते हैं.

नाम को फिर से अपनाना और उस पर बहस करना

यह प्रदर्शनी यह भी दिखाती है कि सेक्स वर्करों ने अपने बारे में इस्तेमाल होने वाली भाषा को कैसे आकार दिया है. ‘सेक्स वर्क' शब्द 1970 के दशक के आखिर में अमेरिकी एक्टिविस्ट कैरोल लीघ ने गढ़ा था. वह एक ऐसा शब्द चाहती थीं जो किसी काम को बताए, न कि कोई नैतिक ठप्पा लगाए. इस बदलाव से एकजुट होने, पहचान बनाने और अपनी बात रखने के लिए जगह बनी.

सेक्स वर्कर एक्टिविस्ट अर्नेस्टीन पास्टोरेलो कहती हैं कि ‘सेक्स वर्क' शब्द को इसलिए ज्यादा पसंद किया जाता है, क्योंकि इसका मतलब ‘ठीक वही है जिसकी असल में बात हो रही है, न उससे ज्यादा और न उससे कम.' यानी, पैसे या दूसरी चीजों के बदले यौन सेवाएं देना, ताकि गुजारा चल सके. उनकी नजर में, यह शब्द चर्चा के लिए स्पष्ट आधार देता है, बजाय उन शब्दों के जो पुरानी नैतिक सोच पर आधारित हैं.

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नजरिए में आया यह बदलाव असल में भी देखने को मिल रहा है. अलग-अलग देशों में सेक्स वर्कर के आंदोलनों ने अपने लिए इस्तेमाल होने वाले अपमानजनक शब्दों को अपनाकर उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया है. उन्होंने ‘एस्कॉर्ट' या ‘स्ट्रिपर' जैसे शब्दों को अपनी मर्जी से चुना है और बाहर से थोपे गए नामों को चुनौती दी है. ये चुनाव इस बात का सबूत हैं कि वे अब अपनी जिंदगी और अपने काम को अपनी शर्तों पर बयां करना चाहते हैं.

इसके साथ ही, कुछ लोग ‘सेक्स वर्क' शब्द के इस्तेमाल पर सवाल भी उठाते हैं.' ‘ग्लोबल अलायंस अगेंस्ट ट्रैफिकिंग इन वीमेन' जैसी संस्थाओं और स्वीडन की नीति विशेषज्ञ गुनीला एकबर्ग जैसी विशेषज्ञों का कहना है कि यह शब्द गंभीर समस्याओं के बीच के अंतर को धुंधला कर देता है. उनका मानना है कि जब हम सबको एक ही नाम (सेक्स वर्क) दे देते हैं, तो उन लोगों को पहचानना मुश्किल हो जाता है जिन्हें गरीबी, दबाव या किसी मजबूरी की वजह से इस काम में धकेला गया है. उनके लिए यह ‘मर्जी का पेशा' नहीं, बल्कि ‘शोषण' का मामला है.

यह असहमति दिखाती है कि भाषा किस तरह से कुछ बातों को तो साफ तौर पर सामने लाती है, लेकिन दूसरों की मजबूरियों को समझना मुश्किल बना देती है.

भाषा और श्रम अधिकार

बतौर पास्टोरेलो, अगर हम अधिकारों की बात करना चाहते हैं, तो सेक्स वर्क को एक ‘काम' की तरह देखना बहुत जरूरी है. वे मानती हैं कि कई लोग मजबूरी में यहां आते हैं, लेकिन उनका मानना है कि जब हम इसे ‘श्रम' कहेंगे, तभी हम इस बारे में बात कर पाएंगे कि इन लोगों को सुरक्षा कैसे मिले, इनके अधिकार क्या हों और ये कैसे एक साथ मिलकर अपनी आवाज उठा सकें.

वह बताती हैं, "इसे काम की तरह देखने से, हमें इस पर ट्रेड यूनियन के नजरिए से बात करने का मौका मिलता है. यह एक बुनियादी सम्मान की बात है कि हमें भी मजदूर माना जाए. इसलिए, हम भी उन्हीं सुरक्षा नियमों और अधिकारों के हकदार हैं जो बाकी कामगारों को मिलते हैं.” उनका मानना है कि पहचान मिलने के लिए ‘सशक्तिकरण' की शर्त नहीं होनी चाहिए. "सेक्स वर्क करने का हमारा अधिकार हमारे श्रम अधिकारों पर निर्भर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि यह हमें सशक्त बनाने वाला है या नहीं.”

कुल मिलाकर, यह प्रदर्शनी संस्कृति, भाषा और असल जिंदगी के अनुभवों के जरिए हमें यह बताती है कि सेक्स वर्क को समझने के लिए सबसे पहले यह मानना जरूरी है कि यह एक उलझा हुआ विषय है. हमें उन शब्दों पर गौर करना होगा जो समाज ने अब तक इस्तेमाल किए हैं. साथ ही, उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा जिन्हें इन शब्दों ने कभी अपनी चर्चा का हिस्सा ही नहीं बनाया और नजरअंदाज कर दिया.

यह प्रदर्शनी ‘सेक्स वर्क- ए कल्चरल हिस्ट्री' बॉन के बुंडेसकुंस्टहाले में 25 अक्टूबर, 2026 तक चलेगी.