एआई टूल्स से गांव देहात तक मेडिकल सुविधा पहुंचाना हुआ आसान

दिल्ली में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट में आशा वर्कर्स, एएनएम नर्स और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को ध्यान में रखकर कई एआई टूल और उपकरण दिखाए गए हैं, जिससे उनका काम थोड़ा आसान और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

दिल्ली में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट में आशा वर्कर्स, एएनएम नर्स और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को ध्यान में रखकर कई एआई टूल और उपकरण दिखाए गए हैं, जिससे उनका काम थोड़ा आसान और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके.भारत के दूरदराज इलाकों में काम कर रही आशा वर्कर इस साल एआई इम्पैक्ट सम्मलेन के केंद्र में हैं. भारत की लास्ट-माइल हेल्थकेयर डिलीवरी काफी हद तक इन आशा, आंगनवाड़ी और एएनएम नेटवर्क पर टिकी है. लेकिन सीमित चिकित्सीय प्रशिक्षण, भारी कागजी काम और विशेषज्ञ सलाह तक देर से पहुंच जैसी चुनौतियां उनके काम को कठिन बनाती हैं. सम्मलेन में इसका जिक्र पैनल डिस्कशन और पॉलिसी संवादों में भी दिखाई दे रहा है.

आशा वर्कर्स के कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उनकी क्षमता का विकास और सही उपकरणों का सहयोग जरूरी है. ऐसे में एआई समाधानों को फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए डिजाइन करना जरुरी हो गया है. गैर-लाभकारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संस्था वाधवानी एआई सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए तकनीक का उपयोग करती है. सम्मलेन में उन्होंने अपने एआई टूल ‘शिशु मापन' और ‘हेल्थवाणी' प्रस्तुत किए.

संस्था से जुड़ी दक्षा दीक्षित डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "ये वर्कर बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों की देखभाल करती हैं. एआई टूल्स उनके काम में सहयोगी की भूमिका निभाते हैं. इससे वे बीमारियों की पहचान कर पाती हैं और मरीजों को समय रहते इलाज मिल सकता है."

हेल्थवाणी- आशा को जवाब देने वाला एआई चैटबॉट

हेल्थवाणी एक एआई-आधारित मोबाइल असिस्टेंट चैटबॉट है. इसके जरिए उत्तरप्रदेश और मेघालय समेत छह राज्यों में आशा वर्कर और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने स्वास्थ्य कार्यों से जुड़े प्रश्नों का रियल-टाइम में उत्तर पा सकती हैं. यह ऐप सरकारी प्राधिकरणों और मंत्रालयों द्वारा प्रकाशित सत्यापित दिशानिर्देशों का उपयोग करता है.

पीपल, प्लैनेट एंड प्रोग्रेस: एआई के भविष्य पर भारत में चर्चा

दक्षा बताती हैं, "कई बार लाभार्थी ऐसे सवाल पूछते हैं जिनका जवाब आशा वर्कर को मालूम नहीं होता. वे अपना सवाल बोलकर पूछ सकती हैं. उन्हें हिंदी, अंग्रेजी, ओड़िया और हिंग्लिश में जवाब मिल जाता है. यह चैटबॉट स्थानीय शब्दों को समझने में भी सक्षम बनाया गया है. इससे वर्कर को भरोसा रहता है कि वे लाभार्थियों को सही जानकारी दे रही हैं.”

नवजातों के विकास और पोषण को मापता एआई

होम बेस्ड न्यूबॉर्न केयर (एचबीएनसी) भारत सरकार का एक कार्यक्रम है. इसके तहत जन्म के शुरुआती 42 दिनों में नवजात शिशु की सेहत की नियमित निगरानी की जाती है. शिशु मापन एक एआई-आधारित डिजिटल ऐप है जो स्मार्टफोन को ही मापने वाले उपकरण में बदल देता है.

शिशु मापन की मदद से आशा वर्कर नवजात बच्चे का वीडियो बनाकर मोबाइल पर अपलोड करती हैं. एआई सेकंडों में वीडियो विश्लेषण के जरिए अनुमानित वजन, लंबाई और माप बताता है. यह ऐप ऑफलाइन भी काम करता है. आम तौर पर आशा वर्कर को इस काम के लिए भारी वजन स्केल, स्प्रिंग बैलेंस, इंफैंटोमीटर, एमयूएसी टेप और अन्य उपकरण टांगकर चलना पड़ता है. मैनुअल माप में गलती का अवसर भी अधिक रहता है.

प्रोडक्ट टीम के सदस्य अथर खान ने डीडब्ल्यू को बताया, "आशा को भारी उपकरण साथ ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती. उन्हें सिर्फ एक स्मार्टफोन चाहिए, जिसमें कम से कम पांच मेगापिक्सल कैमरा और दो जीबी रैम हो. मैन्युअल तरीके से यही प्रक्रिया करने में 25 से 30 मिनट लगते हैं. जबकि हमारा समाधान 10 से 12 सेकंड में ही रिजल्ट देता है. अगर वीडियो सही तरीके से रिकॉर्ड नहीं हुआ हो, तब एआई दोबारा वीडियो अपलोड करने के लिए कहता है. डाटा सर्वर पर अपलोड होने के बाद बच्चे का वीडियो तुरंत मोबाइल फोन से डिलीट हो जाता है."

3नेत्र नियो- प्री-मैच्योर शिशुओं के रेटिना की जांच में मदद करता एआई

फोरस हेल्थ का 3नेत्र नियो एक पोर्टेबल रेटिना स्क्रीनिंग डिवाइस है. इसे खासतौर पर समय से पहले जन्मे बच्चों की आंखों की जांच के लिए बनाया गया है. यह मशीन नवजात बच्चे की आंख की हाई-रेजॉल्यूशन तस्वीरें लेकर रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मेच्योरिटी (आरओपी) की शुरुआती पहचान करने में मदद करती है.

प्री-मैच्योर शिशुओं में रेटिना को मां के गर्भ में पूरी तरह विकसित होने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता. अनुमान है कि हर तीन में से एक प्री -मैच्योर शिशु में आरओपी का खतरा होता है. समय पर जांच न होने पर रेटिना आंख से अलग हो सकता है और बच्चे की दृष्टि जा सकती है. भारत में केवल 200 से 300 विशेषज्ञ डॉक्टर ही सही तरह से मैन्युअल जांच कर पाते हैं.

ऑफिस ही नहीं, किचन का काम भी आसान कर रहा एआई

3नेत्र नियो डिवाइस इस चुनौती को आसान बनाता है. कंपनी कर्नाटक इंटरनेट असिस्टेड डायग्नोसिस ऑफ रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (किडआरओपी) के तहत आशा, आंगनवाड़ी और एएनएम कार्यकर्ताओं को लगभग छह महीने की ट्रेनिंग देकर उन्हें इस उपकरण को चलाने का प्रशिक्षण दे रही है. यह समाधान एआई इम्पैक्ट सम्मलेन में आयोजित 'एआई फॉर ऑल' का फाइनलिस्ट भी रहा.

फोरस हेल्थ के सीनियर मैनेजर शुभजीत बनर्जी पूर्णपात्रा ने बताया, "रेटिना की तस्वीरें केंद्रीय सर्वर पर अपलोड हो जाती हैं. देश में कहीं भी मौजूद डॉक्टर लॉग-इन कर जांच और सलाह दे सकते हैं. एआई इमेज और रिपोर्ट तैयार करने में मदद करता है. साथ ही यह भी गाइड करता है कि सही एंगल और स्पष्टता के साथ तस्वीर कैसे ली जाए."

आर्टलस- दृष्टिहीन होने से बचा सकता है एआई

आर्टलस एक हेल्थ-टेक कंपनी है जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप लर्निंग की मदद से रेटिना से जुड़ी बीमारियों, जैसे डायबिटिक रेटिनोपैथी और ग्लूकोमा, पहचान के लिए डिजिटल टूल और मेडिकल डिवाइस विकसित करती है. इसका उद्देश्य गांवों और कम संसाधन वाले इलाकों में भी सस्ती, तेज और सुलभ आंखों की जांच उपलब्ध कराना है. कंपनी ने एआई सम्मलेन में अपना फंडस कैमरा डिवाइस और पोर्टेबल ओसीटी मशीन प्रदर्शित किए हैं.

आमतौर पर फंडस जांच में लगभग दो घंटे लगते हैं. जबकि आर्टलस के ओसीटी डिवाइस में मरीज को केवल ठुड्डी मशीन पर रखनी होती है. जिसके बाद एआई खुद जांच पूरी कर लेता है. इसे कम प्रशिक्षण वाला व्यक्ति भी आसानी से चला सकता है.

सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (बिजनेस डेवलपमेंट) अबरार अली बताते हैं, "हमने तमिलनाडु, महाराष्ट्र, तेलंगाना और पंजाब में हेल्थ वर्कर्स को प्रशिक्षित किया है. शहरों और गांवों दोनों में आशा की मौजूदगी महत्वपूर्ण है. हमें जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग चाहिए. वे टेक्नोलॉजी और डाटा एंट्री से पहले से परिचित हैं. उनके पास नेटवर्क और भरोसा दोनों होते हैं. ट्रेनिंग देकर हम सिर्फ उनकी स्किल नहीं बढ़ा रहे, बल्कि उनके माध्यम से दृष्टिहीनता की रोकथाम भी कर रहे हैं."

मेरी सहेली- अतिरिक्त आय के लिए एआई की मदद

फ्रंटियर मार्केट्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से महिलाओं को अतिरिक्त कमाई का अवसर देता है. कंपनी का ‘मेरी सहेली' मोबाइल-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म पूरी तरह से महिलाओं के लिए और महिलाओं द्वारा बनाया गया है. ग्रामीण महिलाएं ऐप के जरिए ग्राहकों के लिए ऑर्डर बुक करती हैं और उसकी ट्रैकिंग भी करती हैं. ऐप में ही पेमेंट अपडेट, बिलिंग और डिलीवरी स्टेटस देखा जा सकता है.

‘मेरी सहेली' ऐप माइक्रोसॉफ्ट और कई राज्य सरकारों के साथ काम कर रहा है. वह 21 से 45 साल की उम्र की 40 हजार आशा वर्कर और ग्रामीण महिलाओं को उद्यमी बना चुके हैं. इसकी संस्थापक और सीईओ अजिता शाह का मानना है कि डिजिटल रूप से कमजोर, सही उपकरणों से दूर और डाटा एकत्र करने या सेवाएं उपलब्ध कराने की क्षमता नहीं रखने वाली महिलाओं को अक्सर पहचान नहीं मिलती.

फ्रंटियर मार्केट्स से जुडे विप्लव सिंह बताते हैं, "हम महिलाओं की कार्यशक्ति को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ जोड़ते हैं. महिलाओं को अपना खुद का किराना स्टोर खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. पहले उन्हें सामान लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी. जिसमें समय और पैसा दोनों लगते थे, लेकिन अब वे हमारे ऐप पर ही ऑर्डर कर सकती हैं. ये प्रोडक्ट बाजार कीमत से कम दाम पर मिलते हैं. हम कोई डिलीवरी चार्ज नहीं लेते."

वाराणसी की रूचि सिंह पिछले तीन सालों से 'मेरी सहेली' का इस्तेमाल कर रही हैं. उनकी गांव में किराना दुकान हैं. वह महीने का 20 से 30 हजार रूपए कमाती हैं. रूचि ने डीडब्ल्यू से बातचीत में अपना अनुभव साझा किया, "गांव की किसी महिला को वॉशिंग मशीन, कूलर, पंखा या दाल-चावल जैसे सामान की जरूरत होती है, मैं उनके लिए भी ऐप पर ऑर्डर कर देती हूं. साथ ही, ब्रांड्स के लिए ऐप पर सर्वे भरती हूं. इन सबके लिए मुझे कमीशन मिलता है. शुरुआत में तकनीक को सीखने में बहुत दिक्कत आती है. लेकिन अब ऐप में मौजूद चैटबॉट ऑर्डर करने से लेकर पेमेंट तक पूरी प्रक्रिया में मेरी मदद करता है."

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