नई दिल्ली, 8 जून: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Social Media Platforms) , विशेष रूप से 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर जून 2026 के शुरुआती हफ्तों में एक सनसनीखेज दावा तेजी से प्रसारित किया जा रहा है. इन वायरल पोस्ट्स (Viral Posts) में यह झूठ फैलाया जा रहा है कि दिवंगत अमेरिकी अपराधी जेफ्री एपस्टीन (Jeffrey Epstein) से जुड़ी नई खुली फाइलों से यह खुलासा हुआ है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने एपस्टीन के निजी द्वीप (Epstein Island) का 320 से अधिक बार दौरा किया था. हालांकि, अमेरिकी अदालतों और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जारी किए गए वास्तविक प्राथमिक दस्तावेजों के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट हो गया है कि इस भ्रामक दावे का दस्तावेजों में कोई अस्तित्व या प्रमाण नहीं है. यह भी पढ़ें: Fact Check: क्या सरकार ने EPS-95 न्यूनतम पेंशन बढ़ाकर 7500 रुपये कर दी? जानें सोशल मीडिया पर वायरल पत्र का पूरा सच
क्या पीएम मोदी ने कभी किया एपस्टीन आइलैंड का दौरा?
वास्तविक रिकॉर्ड्स के अनुसार, जेफ्री एपस्टीन के आधिकारिक दस्तावेजों, उड़ान लॉग (Flight Logs), अदालती बयानों या किसी भी गवाह की गवाही में पीएम मोदी या किसी भी भारतीय शीर्ष नेता द्वारा एपस्टीन के द्वीप पर जाने का कोई उल्लेख या साक्ष्य बिल्कुल नहीं है.
दस्तावेजों में पीएम मोदी का नाम बेहद सीमित और अप्रत्यक्ष (Tangential) संदर्भ में केवल एपस्टीन के वर्ष 2017 के कुछ निजी ईमेल में सामने आता है. एक ईमेल में, एपस्टीन ने दावा किया था कि उसने जुलाई 2017 में पीएम मोदी की इजराइल की ऐतिहासिक राजकीय यात्रा (जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली इजराइल यात्रा थी) से ठीक पहले उन्हें कुछ सलाह दी थी. एपस्टीन ने अपने ईमेल में लिखा था कि मोदी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मिलने के बाद "सलाह ली और अमेरिकी राष्ट्रपति के लाभ के लिए इजराइल में नृत्य और गान किया". हालांकि, विशेषज्ञ इसे एक अपराधी की मनगढ़ंत और काल्पनिक सोच मान रहे हैं, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है. यह भी पढ़ें: Fact Check: क्या पीएम मोदी ने 'ग्रेटर इजरायल और अखंड भारत' पर दिया बयान? वायरल वीडियो निकला डीपफेक
नरेंद्र मोदी के एपस्टीन आइलैंड से जुड़े दावे का खंडन

भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) का कड़ा रुख
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs - MEA) ने इस ईमेल में निहित निहितार्थों और दावों को सिरे से खारिज करते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया है. विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में तीखा रुख अपनाते हुए एपस्टीन के इस ईमेल को "एक सजायाफ्ता अपराधी की घटिया और कचरा सोच" (Trashy ruminations of a convicted criminal) करार दिया है, जिसका वास्तविकता में कोई आधार नहीं है.
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2017 की इजराइल यात्रा पूरी तरह से एक सार्वजनिक, आधिकारिक और द्विपक्षीय राजनयिक जुड़ाव थी, जिसका जेफ्री एपस्टीन या उसकी किसी भी गतिविधि से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था.
एपस्टीन फाइल्स 2026 की पृष्ठभूमि
उल्लेखनीय है कि यौन अपराधों के दोषी जेफ्री एपस्टीन की वर्ष 2019 में अमेरिकी जेल में मृत्यु हो गई थी. इसके बाद, अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित 'एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट' के तहत इस मामले से जुड़े गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया चल रही है. इसी कानून के तहत, अमेरिकी न्याय विभाग (US Department of Justice) ने जनवरी 2026 के अंत में 30 लाख से अधिक पन्नों का एक विशाल दस्तावेजी संग्रह जारी किया था, जिसमें ईमेल, संदेश और अदालती रिकॉर्ड शामिल थे.
इन दस्तावेजों में दुनिया भर की कई हाई-प्रोफाइल हस्तियों और वैश्विक नेताओं के नामों का उल्लेख अलग-अलग संदर्भों में हुआ है. सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ तत्वों ने इन्हीं फाइलों के सीमित और सार्वजनिक संदर्भों को तोड़-मरोड़कर और बढ़ा-चढ़ाकर पीएम मोदी के खिलाफ 320 बार द्वीप पर जाने की झूठी कहानी को पूरी तरह से मनगढ़ंत रूप दे दिया है.
Primary Documents की जांच है आवश्यक
ऐतिहासिक रूप से, पीएम मोदी की 2017 की उस इजराइल यात्रा ने भारत और इजराइल के बीच रक्षा, आधुनिक तकनीक और कृषि के क्षेत्रों में रणनीतिक संबंधों को अभूतपूर्व मजबूती दी थी, जिसे तत्कालीन वैश्विक मीडिया ने व्यापक रूप से कवर किया था.
यह पूरा प्रकरण यह रेखांकित करता है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी सनसनीखेज हेडलाइन पर भरोसा करने के बजाय दावों की पुष्टि हमेशा प्राथमिक विधिक दस्तावेजों और आधिकारिक बयानों से करना कितना आवश्यक है. पीएम मोदी के मामले में एपस्टीन के ईमेल के संदर्भ पूरी तरह से असत्यापित, काल्पनिक और आधिकारिक तौर पर खारिज किए जा चुके हैं.













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