Muharram 2026: भारत और सऊदी अरब में कब से शुरू होगा इस्लामी नया साल, जानें क्या है आशूरा का इतिहास
दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय के लोग इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम 2026 के स्वागत की तैयारियां कर रहे हैं. इसके साथ ही नए इस्लामी वर्ष 1448 हिजरी की शुरुआत हो जाएगी. आइए जानते हैं भारत और सऊदी अरब में मुहर्रम की संभावित तारीखें, आशूरा का महत्व और कर्बला का ऐतिहासिक संदर्भ.
Muharram 2026: दुनिया भर में मुस्लिम समुदाय के लोग इस्लामी हिजरी कैलेंडर के पहले महीने 'मुहर्रम' के आगमन की तैयारियों में जुट गए हैं. इस महीने की शुरुआत के साथ ही नए इस्लामी साल 1448 हिजरी (1448 AH) का आगाज हो जाएगा. मुहर्रम का महीना वैश्विक मुस्लिम समुदाय के लिए आध्यात्मिक चिंतन और इबादत का समय माना जाता है. हर साल की तरह इस बार भी मुहर्रम की सटीक तारीख स्थानीय स्तर पर चांद के दीदार (चंद्र दर्शन) पर निर्भर करेगी. इस वजह से भौगोलिक स्थितियों के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में तारीखों में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है. आमतौर पर सऊदी अरब सहित खाड़ी देशों में भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में यह महीना एक दिन पहले शुरू होता है.
इस्लामी चंद्र कैलेंडर की व्यवस्था
इस्लामी कैलेंडर पूरी तरह से चंद्र प्रणाली (लूनर सिस्टम) पर आधारित है. इसमें महीनों की गणना सूर्य के बजाय चंद्रमा के चक्र को देखकर की जाती है, जो कि ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेंडर से अलग है. चूंकि चंद्र वर्ष सौर वर्ष की तुलना में लगभग 11 से 12 दिन छोटा होता है, इसलिए इस्लामी तारीखें हर साल मौसम के चक्र के पीछे खिसकती रहती हैं. यह भी पढ़े: Muharram 2025 Holiday Date in India: आशूरा 6 या 7 जुलाई को? जानें स्कूल, बैंक और शेयर बाजार रहेंगे खुले या बंद
इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक नए महीने की शुरुआत पिछले महीने के 29वें दिन शाम को अर्धचंद्र (हिलाल) दिखने के बाद ही प्रमाणित मानी जाती है. यदि खराब मौसम या भौगोलिक सीमाओं के कारण चांद नजर नहीं आता है, तो मौजूदा महीना 30 दिनों का माना जाता है. इसके अगले दिन से नए महीने की शुरुआत आधिकारिक तौर पर होती है.
मुहर्रम 2026 की तारीख और आशूरा कब है?
सऊदी अरब में इस बार जुल्-हिज्जा का महीना 18 मई से शुरू हुआ था. इस लिहाज से वहां इस महीने का 29वां दिन 15 जून को पड़ रहा है. अगर 15 जून की शाम को वहां चांद दिखाई देता है, तो सऊदी अरब में मुहर्रम की शुरुआत 16 जून से होगी, अन्यथा यह 17 जून से शुरू होगा. इसी गणना के आधार पर मुहर्रम का सबसे महत्वपूर्ण 10वां दिन, जिसे 'आशूरा' कहा जाता है, सऊदी अरब में 25 जून या 26 जून को मनाए जाने की संभावना है.
भारत में जुल्-हिज्जा का चांद एक दिन बाद देखा गया था, जिससे यहां इस महीने की शुरुआत 19 मई को हुई थी. इस कारण भारत में इस महीने का 29वां दिन 16 जून को होगा. यदि 16 जून की शाम को भारत में चांद नजर आता है, तो मुहर्रम की शुरुआत 17 जून या 18 जून से होगी. इसके अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप में आशूरा का दिन 26 जून या 27 जून को पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है.
आशूरा का महत्व: शिया और सुन्नी परंपराओं में अलग दृष्टिकोण
आज के समय में इस्लाम के दो प्रमुख संप्रदायों (शिया और सुन्नी) में आशूरा के दिन का अलग-अलग धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है, हालांकि दोनों ही इसे बेहद सम्मान और शिद्दत के साथ देखते हैं.
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शिया परंपरा: शिया समुदाय के लिए आशूरा का दिन अत्यंत शोक और गम का प्रतीक है. इसे अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध, सर्वोच्च बलिदान और शहादत के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है. इस दिन शिया मुस्लिम मजलिसों (धार्मिक सभाओं), जुलूसों और 'ताजिया' के माध्यम से कर्बला की ऐतिहासिक त्रासदी को याद करते हैं. इमाम हुसैन और उनके परिवार द्वारा कर्बला के मैदान में झेली गई शारीरिक यातनाओं और शहादत के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करने के लिए लोग मातम भी करते हैं.
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सुन्नी परंपरा: सुन्नी समुदाय में भी इमाम हुसैन की शहादत का बेहद सम्मान किया जाता है, लेकिन परंपरागत रूप से इस दिन को अल्लाह द्वारा मूसा (मोसेस) और इजरायलियों को मिस्र के फिरौन (फॉरो) के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के रूप में याद किया जाता है. पैगंबर मुहम्मद की सुन्नत (परंपरा) का पालन करते हुए कई सुन्नी मुस्लिम मुहर्रम के 9वें और 10वें दिन (या 10वें और 11वें दिन) नफिल (ऐच्छिक) रोजा रखते हैं.
कर्बला की जंग का इतिहास
मुहर्रम हालांकि नए साल की शुरुआत का प्रतीक है, लेकिन इसके पहले 10 दिन गंभीर शोक और यादों से जुड़े होते हैं, जो आशूरा के दिन अपने चरम पर पहुंचते हैं. यह दिन 680 ईस्वी (61 हिजरी) में आधुनिक इराक के कर्बला के मैदान में लड़ी गई ऐतिहासिक जंग की याद दिलाता है.
यह संघर्ष पहले उमय्यद खलीफा अमीर मुआविया की मृत्यु के बाद शुरू हुआ, जब उनके बेटे यजीद प्रथम ने सत्ता संभाली और मुस्लिम समुदाय से अपनी अधीनता स्वीकार करने (बैअत करने) की मांग की. पैगंबर मुहम्मद के नवासे (पोते) और चौथे खलीफा अली के पुत्र इमाम हुसैन इब्न अली ने यजीद के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से साफ इनकार कर दिया. उनका मानना था कि यजीद का शासन नाजायज है और वह न्याय के इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ है.
इसके बाद इमाम हुसैन अपने परिवार के सदस्यों और करीब 72 साथियों के एक छोटे से काफिले के साथ मक्का से कूफा की ओर निकले, लेकिन कर्बला के रेगिस्तान में यजीद की एक बहुत बड़ी फौज ने उन्हें घेर लिया. कई दिनों तक चली इस घेराबंदी के दौरान हुसैन के काफिले का पास बहने वाली फरात नदी से पानी का संपर्क पूरी तरह काट दिया गया. आखिरकार, मुहर्रम की 10वीं तारीख को हुए इस बेहद असमान युद्ध में इमाम हुसैन और उनके लगभग सभी पुरुष साथी वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गए.