HC on Women Intimate Images: मद्रास हाई कोर्ट की गंभीर नसीहत, रिश्तों में विश्वास कितना भी गहरा हो; भूलकर भी शेयर न करें अपनी इंटीमेट तस्वीरें और वीडियो
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक बलात्कार और ब्लैकमेलिंग मामले में आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए महिलाओं के लिए तीन भाषाओं (अंग्रेजी, तमिल और हिंदी) में एक विशेष एडवाइजरी जारी की है. कोर्ट ने आगाह किया है कि रिश्तों में भरोसे या प्यार के नाम पर अपनी निजी व अंतरंग तस्वीरें कभी भी डिजिटल माध्यम से साझा न करें.
चेन्नई: मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) की मदुरै पीठ ने डिजिटल युग में महिलाओं की सुरक्षा, प्राइवेसी (निजता) और गरिमा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है. कोर्ट ने युवा लड़कियों और महिलाओं से अपील की है कि वे अपने पार्टनर के साथ कितने भी गहरे रिश्ते, भरोसे या सुरक्षा के वादे में क्यों न हों, इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से अपनी अंतरंग (इंटीमेट) तस्वीरें या वीडियो (Intimate Photo or Video) कभी भी साझा न करें.
जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि एक पल का गलत भरोसा जीवन भर की पीड़ा बन सकता है. इस संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाने के लिए अदालत ने अपने फैसले में हिंदी, अंग्रेजी और तमिल भाषाओं में एक विशेष परामर्श (एडवाइजरी) शामिल की है और मीडिया से इसे बड़े पैमाने पर प्रसारित करने का आग्रह किया है. यह भी पढ़ें: HC on Aadhar and Age: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, मोटर दुर्घटना दावों में उम्र का विश्वसनीय प्रमाण नहीं है आधार कार्ड; बीमा कंपनियों के दायित्व पर भी स्थिति साफ
'एक बार नियंत्रण खोने पर भुगतना पड़ता है गंभीर परिणाम'
उच्च न्यायालय ने अपनी एडवाइजरी में बेहद तार्किक ढंग से समझाया है कि जब कोई अंतरंग फोटो या वीडियो किसी व्यक्ति के विशेष नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तो उसका दुरुपयोग करना बेहद आसान हो जाता है.
अदालत ने कहा:
"प्यार, विश्वास या गोपनीयता के वादे कितने भी गहरे क्यों न दिखें, डिजिटल माध्यमों से ऐसी सामग्री कभी भी साझा नहीं की जानी चाहिए. ऐसी तस्वीरों या वीडियो का दुरुपयोग पीड़िता की प्राइवेसी, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति (असाध्य नुकसान) पहुंचाता है. किसी भी संकट के बाद कानूनी उपाय खोजने की कठिन प्रक्रिया से गुजरने के बजाय पहले से ही एहतियात बरतना हमेशा बेहतर होता है."
न्यायाधीशों ने मानव सभ्यता के इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि निजता और शालीनता हमेशा से मानव गरिमा का अभिन्न हिस्सा रही हैं. लेकिन आज डिजिटल युग में कुछ अनैतिक लोग लड़कियों की भावनाओं और भरोसे का फायदा उठाकर उन्हें जाल में फंसाते हैं. वे प्यार के झूठे वादों या ब्लैकमेलिंग के जरिए ऐसी संवेदनशील तस्वीरें हासिल करते हैं और फिर उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी देकर लगातार शोषण करते हैं.
मद्रास हाई कोर्ट की गंभीर नसीहत
Madras High Court urges women in relationships not to share intimate images
Read here: https://t.co/ztoipS7zed pic.twitter.com/RtyVn3mDVv
— Bar and Bench (@barandbench) July 15, 2026
'रोमांस फ्रॉड' के कुख्यात काशी मामले में कोर्ट ने सुनाया फैसला
यह ऐतिहासिक टिप्पणी कोर्ट ने कुख्यात अपराधी टी. काशी उर्फ सुजी की याचिका खारिज करते हुए की. कन्याकुमारी के रहने वाले काशी ने फेसबुक के माध्यम से एक महिला से संपर्क साधा था. उसने महिला को नौकरी और शादी का झांसा देकर उसका भरोसा जीता, शारीरिक शोषण किया और गुपचुप तरीके से उसके अंतरंग वीडियो बना लिए. इसके बाद उसने इन वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी देकर महिला से लाखों रुपये की वसूली की.
ट्रायल कोर्ट (Fastrack Mahila Court, Nagercoil) ने काशी को दोषी मानते हुए प्राकृतिक मृत्यु (Natural Death) होने तक कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. हाई कोर्ट ने इस मामले को 'रोमांस फ्रॉड' (Romance Fraud), धोखे से बलात्कार और यौन जबरन वसूली (Sexual Extortion) का सबसे घृणित और क्लासिक उदाहरण बताते हुए सजा को पूरी तरह बरकरार रखा.
जांचकर्ताओं और न्यायाधीशों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी चिंता
फैसले के एक महत्वपूर्ण हिस्से में जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने इस तरह के संवेदनशील मामलों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों, वकीलों और न्यायाधीशों के मानसिक स्वास्थ्य (Mental Well-being) पर भी चिंता व्यक्त की. दरअसल, मामले की जांच के दौरान महिला जांच अधिकारी को साक्ष्य जुटाने के लिए करीब 60 अश्लील फाइलों को देखना पड़ा था.
जस्टिस वेंकटेश ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक आपत्तिजनक डिजिटल सामग्रियों को लगातार देखने से जांचकर्ताओं के दिमाग पर गहरा मनोवैज्ञानिक आघात (Vicarious Trauma) पहुंचता है. कानून ने सबूतों की तकनीकी प्रामाणिकता के लिए कड़े नियम तो बनाए हैं, लेकिन वह यह भूल गया कि ये डिजिटल फाइलें इंसानी दिमाग को भी नुकसान पहुंचाती हैं.
अदालत ने इसके समाधान के लिए संस्थानिक बदलाव करने की सिफारिश की है, जिसमें:
- ऐसे आपत्तिजनक डेटा को संभालने वाले कर्मियों का अनिवार्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Screening) किया जाए.
- उन्हें नियमित रूप से मानसिक काउंसलिंग की सुविधा प्रदान की जाए.
- तनाव कम करने के लिए 'डीकंप्रेशन प्रोटोकॉल' (Decompression Protocols) लागू किए जाएं.
- ग्राफिक डिजिटल सबूतों को संभालने वाली टीम के सदस्यों को नियमित समय पर रोटेट (बदला) किया जाए.
हाई कोर्ट की यह एडवाइजरी केवल महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के हर उस नागरिक के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है जो अनजाने में इंटरनेट और सोशल मीडिया की इस डार्क साइड का शिकार बन जाते हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 15, 2026 07:46 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

