भारत के प्रमुख त्योहारों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है. अधिकांश भारतीय त्योहार चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं और उनकी तारीखें हर साल बदलती रहती हैं, लेकिन मकर संक्रांति को आमतौर पर 14 जनवरी के साथ जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, खगोलीय गणनाओं और इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि मकर संक्रांति की तारीख स्थिर नहीं है. साल 2026 में भी यह 14 जनवरी को मनाई जा रही है, लेकिन भविष्य में यह तारीख धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाएगी.
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश
'संक्रांति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना. जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तो उसे मकर संक्रांति कहा जाता है. इसी दिन से सूर्य 'उत्तरायण' की ओर अग्रसर होता है, यानी पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं. वैज्ञानिक रूप से यह शीतकालीन संक्रांति (Winter Solstice) के कुछ समय बाद होता है.
तारीखें बदलने का वैज्ञानिक कारण
Makar Sankranti Is Decided According To This Thing- मकर संक्रांति की तारीख हर साल 14 जनवरी न रहने के पीछे 'अयनचलन' (Precession of Equinoxes) की प्रक्रिया जिम्मेदार है. पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते समय थोड़ा डगमगाती है. इस कारण, हर 72 से 80 साल में मकर संक्रांति की तिथि एक दिन आगे खिसक जाती है.
19वीं सदी में: यह त्योहार अक्सर 13 जनवरी को मनाया जाता था.
वर्तमान काल में: अब यह 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है.
भविष्य की गणना: वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों के अनुसार, साल 2100 के बाद मकर संक्रांति 16 जनवरी को मनाई जाने लगेगी.
इतिहास क्या कहता है?
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान मकर संक्रांति 10 जनवरी के आसपास आती थी. वहीं, और पीछे जाएं तो आर्यभट्ट के समय में यह दिसंबर के अंत में मनाई जाती थी. हिंदू पंचांग 'निरयण' (Sidereal) गणना का उपयोग करता है, जो सितारों की स्थिति पर आधारित है, जबकि पश्चिमी कैलेंडर 'सायाना' (Tropical) गणना का उपयोग करता है. इसी अंतर के कारण मकर संक्रांति की तारीखें समय के साथ बदलती रहती हैं.
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
तारीखों के बदलाव के बावजूद, इस त्योहार का महत्व कम नहीं होता. मकर संक्रांति को फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है. दक्षिण भारत में इसे 'पोंगल', पंजाब में 'लोहड़ी' और असम में 'बिहू' के नाम से जाना जाता है. यह दिन दान-पुण्य, पवित्र नदियों में स्नान और खिचड़ी व तिल-गुड़ के सेवन के लिए समर्पित है.
2026 की विशेष जानकारी
इस वर्ष 14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति का पुण्यकाल दोपहर से शुरू हो रहा है. खगोलविदों के अनुसार, सूर्य का मकर राशि में गोचर बुधवार की दोपहर को होगा, जिससे 14 जनवरी का दिन ही उत्सव के लिए सबसे उपयुक्त माना जा रहा है.













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