Marital Rape Case: जबरन शारीरिक संबंध की शिकार पत्नी निसंदेह पीड़िता; सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- अपवाद रद्द किए बिना पति पर कैसे चले रेप का केस?
वैवाहिक बलात्कार को अपराध के दायरे से बाहर रखने वाले वैधानिक अपवाद को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि पति द्वारा जबरन यौन संबंध की शिकार महिला "निसंदेह एक पीड़िता" है.
नई दिल्ली: वैवाहिक संबंधों में पत्नी की सहमति के बिना बनाए जाने वाले शारीरिक संबंध को आपराधिक दायरे में लाने से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 9 सितंबर को अहम कानूनी बिंदुओं पर विचार-विमर्श किया. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट कहा कि विवाह में जबरन संबंध का शिकार होने वाली महिला निश्चित रूप से एक पीड़िता है. यह भी पढ़ें: Marital Rape Case: 'विवाह महिला की स्वायत्तता का अंत नहीं'; सुप्रीम कोर्ट पहले सुनेगा कर्नाटक हाईकोर्ट का 'सेक्स स्लेव' फैसला, अंतिम सुनवाई तय
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दंडात्मक कानून (Penal Law) के सिद्धांतों का हवाला देते हुए पूछा कि जब पूर्ववर्ती आईपीसी की धारा 375 (वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता की धारा 63) में वैवाहिक संबंध को स्पष्ट रूप से दुष्कर्म के अपराध से अलग रखने का प्रावधान मौजूद है, तो उस अपवाद को रद्द किए बिना किसी पति पर इस धारा के तहत मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है?
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने दोनों पक्षों को दस्तावेज संकलित करने के निर्देश दिए और अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध कर दी.
सबसे पहले कर्नाटक के 'सेक्स स्लेव' मामले पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील भी शामिल है, जिसमें पत्नी को 'सेक्स स्लेव' (यौन गुलाम) की तरह रखने के आरोपी पति पर दुष्कर्म का मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी:
- हाईकोर्ट के आदेश का बचाव: कर्नाटक मामले में पत्नी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने कानून के अपवाद को सीधे रद्द नहीं किया था, बल्कि मामले के गंभीर तथ्यों को देखते हुए मौजूदा कानून की व्याख्या की थी. उन्होंने कहा कि वे मौजूदा वैधानिक प्रावधान की ऐसी व्याख्या के पक्ष में बहस करेंगी जिससे अपवाद को हटाए बिना भी ऐसे मामलों में मुकदमा चलाया जा सके.
- पीठ की टिप्पणी: सीजेआई सूर्यकांत ने इस पर कहा कि यह कानून का एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल है कि जिस प्रावधान में स्पष्ट अपवाद दर्ज हो, क्या उसकी ऐसी व्याख्या की जा सकती है जो किसी व्यक्ति पर आपराधिक दायित्व तय कर दे.
सर्वोच्च अदालत के समक्ष दो प्रमुख संवैधानिक प्रश्न
पीठ ने रेखांकित किया कि इस पूरे विवाद में दो मुख्य पहलू शामिल हैं:
- व्याख्या का सवाल: क्या वैवाहिक बलात्कार के मौजूदा अपवाद की सीमित व्याख्या की जा सकती है ताकि अत्यधिक क्रूरता या विशेष परिस्थितियों में मुकदमा कायम रखा जा सके?
- संवैधानिकता की चुनौती: क्या कानून में दिया गया यह अपवाद स्वयं संविधान के मूल अधिकारों (अनुच्छेद 14 और 21) का उल्लंघन करता है और इसे पूरी तरह निरस्त कर दिया जाना चाहिए?
पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत दोनों सवालों का जवाब देगी, लेकिन सीधे संवैधानिक वैधता पर फैसला देने से पहले कर्नाटक मामले में व्याख्या के पहलू को परखा जाएगा.
'दंडात्मक कानून में जल्दबाजी नहीं, वैधानिक सीमाएं तय करना जरूरी': जस्टिस बागची
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि विवाह से किसी महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता (Personal Autonomy) खत्म नहीं होती, लेकिन अदालत एक आपराधिक कानून की समीक्षा कर रही है:
- अपराध की परिभाषा का सवाल: जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, "हम पीड़ितों की पूरी रक्षा करेंगे, लेकिन जब धारा 375 में एक स्पष्ट अपवाद परिभाषित है, तो क्या अभियोजन पक्ष के अधिकार क्षेत्र में यह आता है कि वह किसी पर उसी कृत्य के लिए मुकदमा चलाए? जब तक कोई संवैधानिक अदालत यह फैसला न दे दे कि वह अपवाद मनमाना या असंवैधानिक है, तब तक क्या इस आधार पर मुकदमे की अनुमति दी जा सकती है?"
- अन्य धाराओं में सुरक्षा: पीठ ने स्पष्ट किया कि अपवाद के बावजूद वैवाहिक क्रूरता, गंभीर चोट या गैर-इरादतन हत्या जैसे अपराध अन्य दंडात्मक धाराओं के तहत पहले से दंडनीय हैं.
तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को होगी अंतिम बहस
यह कानूनी विवाद दिल्ली हाईकोर्ट के मई 2022 के उस खंडित फैसले (Split Verdict) के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जहां एक जज ने अपवाद को असंवैधानिक करार दिया था, जबकि दूसरे जज ने इसे वैध ठहराया था.
सुप्रीम कोर्ट ने नोडल वकीलों को सभी दलीलें, पूर्व निर्णय और दस्तावेज दो सप्ताह में संकलित करने को कहा है. केंद्र सरकार द्वारा दाखिल जवाब की प्रतियां भी सभी पक्षों को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं. शीर्ष अदालत तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार के दिनों में इस मामले पर निर्णायक व अंतिम सुनवाई शुरू करेगी. कानूनी पहलुओं की विस्तृत जानकारी Bar & Bench की रिपोर्ट में भी देखी जा सकती है.