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Kerala High Court: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निकाह भी नहीं बचाएगा; 18 साल से कम उम्र की पत्नी से शारीरिक संबंध POCSO और रेप के तहत अपराध

केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई मुस्लिम पुरुष 18 वर्ष से कम आयु की अपनी नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, तो वह पॉक्सो अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दुष्कर्म के आरोप में मुकदमा चलाने का पात्र होगा. अदालत ने कहा कि जब मामला किसी नाबालिग का हो, तो पर्सनल लॉ या धार्मिक रीति-रिवाजों से हुआ निकाह किसी भी तरह की कानूनी छूट या प्रतिरक्षा प्रदान नहीं कर सकता.

Kerala High Court: मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निकाह भी नहीं बचाएगा; 18 साल से कम उम्र की पत्नी से शारीरिक संबंध POCSO और रेप के तहत अपराध
Kerala High Court (Photo Credits: PTI)

कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने अपने एक अहम फैसले में व्यवस्था दी है कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कोई कानूनी राहत नहीं मिलेगी. ऐसा कृत्य यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दुष्कर्म की श्रेणी में आएगा.

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बाल संरक्षण कानूनों के समक्ष किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत कानून (Personal Law) या विवाह का दावा बचाव का आधार नहीं बन सकता. यह भी पढ़ें: Kerala: शख्स ने तुलसी के पौधे पर डाले प्राइवेट पार्ट्स के बाल, हाई कोर्ट ने दिया कार्रवाई का आदेश

पर्सनल लॉ का निकाह आपराधिक दायित्व से नहीं बचा सकता: हाईकोर्ट

न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन (Justice Jobin Sebastian) की एकल पीठ ने आरोपी द्वारा आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की:

"यदि तर्क के लिए यह मान भी लिया जाए कि विवाह मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था, तब भी यह याचिकाकर्ता के आपराधिक दायित्व को खत्म नहीं कर सकता. कथित निकाह और शारीरिक संबंधों के समय पीड़िता की आयु मात्र 17 वर्ष थी. यदि विवाह का कोई भी पक्षकार नाबालिग है, तो पर्सनल लॉ के तहत विवाह की वैधता के बावजूद पॉक्सो एक्ट के प्रावधान स्पष्ट रूप से लागू होंगे."

सुप्रीम कोर्ट के 'Independent Thought' फैसले का संदर्भ

उच्च न्यायालय ने इस मामले में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय 'इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' (2017) का उल्लेख किया:

  • सहमति और विवाह की उम्र: सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वैवाहिक बलात्कार की छूट के लिए पत्नी की न्यूनतम आयु सीमा 15 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी थी.
  • आईपीसी धारा 375 (अपवाद 2): कोर्ट ने रेखांकित किया कि 18 वर्ष से कम आयु की किशोरी के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाला व्यक्ति आईपीसी की धारा 376 के तहत मुकदमा चलाने के दायरे में आता है, भले ही वह पीड़िता उसकी विवाहित पत्नी ही क्यों न हो. इसलिए आरोपी धारा 375 के अपवाद 2 की आड़ लेकर मुकदमे से नहीं बच सकता.

क्या था मामला और कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी पर 17 वर्षीय किशोरी का अपहरण कर अपने घर ले जाने और उसके साथ लगातार शारीरिक शोषण करने का आरोप था. वहीं, आरोपी ने दावा किया था कि उसने इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार दोनों परिवारों की सहमति से निकाह किया था और संबंध सहमति पर आधारित थे.

  • ट्रायल का विषय: हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत शुरुआती स्तर पर मिनी-ट्रायल चलाकर गवाहों और सबूतों का आकलन नहीं किया जा सकता.  निकाह वैध था या नहीं, यह ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर तय होगा.
  • पॉक्सो कानून की प्राथमिकता: कोर्ट ने दोहराया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 42A के अनुसार, किसी भी असंगत पर्सनल या प्रथागत कानून पर पॉक्सो के प्रावधानों को सर्वोपरि (Overriding effect) प्रभाव प्राप्त है. इसके साथ ही अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया.

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 31, 2026 09:11 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).