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क्या है पूजा स्थल अधिनियम 1991, जिसे रद्द करने की उठी मांग

बीजेपी सांसद हरनाथ सिंह यादव ने सोमवार को राज्यसभा में मांग की कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को रद्द कर दिया जाना चाहिए.

क्या है पूजा स्थल अधिनियम 1991, जिसे रद्द करने की उठी मांग
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

बीजेपी सांसद हरनाथ सिंह यादव ने सोमवार को राज्यसभा में मांग की कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को रद्द कर दिया जाना चाहिए. आखिर क्या है पूजा स्थल अधिनियम और क्यों हो रही इसे रद्द करने की मांग.वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद के व्यास तहखाने में पूजा की इजाजत मिलने के बाद पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को खत्म करने की मांग बीजेपी के सांसद ने सोमवार को राज्यसभा में उठाई. बीजेपी सांसद हरनाथ सिंह यादव ने यह मामला उठाया और इसे रद्द करने की मांग की.

राज्य सभा में शून्यकाल के दौरान हरनाथ सिंह ने कहा, "पूजा स्थल अधिनियम पूरी तरह से अतार्किक और असंवैधानिक है. यह संविधान के तहत हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों के धार्मिक अधिकारों को कम कर देता है. यह देश में सांप्रदायिक सौहार्द को भी नुकसान पहुंचा रहा है." उन्होंने कहा, "इसलिए, मैं सरकार से राष्ट्रहित में इस कानून को तुरंत रद्द करने का आग्रह करता हूं."

उन्होंने यह भी कहा, "यह कानून भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के बीच भेद करता है जबकि दोनों भगवान विष्णु के अवतार हैं. यह कानून हिंदू, जैन, सिख, बौद्धों के धार्मिक अधिकारों का हनन करता है."

बीजेपी के सांसद ने कहा कि यह कानून संविधान में दिए गए समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है. उन्होंने सवाल उठाया कि यह कानून न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है. इसके अलावा पूजा स्थल अधिनियम में 15 अगस्त, 1947 की तारीख को बीजेपी सांसद ने मनमाना करार दिया.

हरनाथ सिंह की मांग वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मुकदमे से जुड़ी चल रही कानूनी लड़ाई की पृष्ठभूमि में आई है, जहां हिंदू पक्षों का दावा है कि मौजूदा मस्जिदों का निर्माण हिंदू मंदिरों पर किया गया है. कोर्ट में याचिका डालकर मंदिरों की बहाली की मांग की गई है.

दोनों ही मामले अदालत में चल रहे हैं. 31 जनवरी को वाराणसी की एक अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर स्थित व्यास तहखाने में हिंदू पक्ष को पूजा करने का अधिकार दिया था.

1991 के पूजा स्थल कानून का हवाला देते हुए मुसलमान पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद को भी कानून के जरिए उसी रास्ते पर ले जाने की कोशिश की जा रही है, जैसे बाबरी मस्जिद को विवादित बनाकर पहले गिरा दिया गया और फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भव्य मंदिर का निर्माण हुआ.

ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने में पूजा की इजाजत के बाद 2 फरवरी को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने कड़ी आपत्ति जताई थी और कहा था कि वाराणसी कोर्ट ने जल्दबाजी में फैसला सुनाया है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा, "कोर्ट ने सबूतों और तथ्यों को नजरअंदाज किया और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को मानने से इनकार कर दिया, जो किसी भी पूजा स्थल के स्वभाव और प्रकृति में परिवर्तन पर रोक लगाता है. अगर पूजा स्थल अधिनियम को अदालतों द्वारा बरकरार नहीं रखा जाता है, तो हम इसी तरह के मामले देख सकते हैं, जो देश में अंतहीन सांप्रदायिक संघर्ष को पैदा कर सकते हैं."

कांग्रेस ने जताया विरोध

इससे पहले कांग्रेस ने राज्यसभा में एक निजी विधेयक पेश करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जिसमें पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को निरस्त करने की मांग की गई है.

पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) निरसन विधेयक, 2022 को शुक्रवार को बीजेपी के सांसद हरनाथ सिंह यादव द्वारा राज्य सभा में पेश करने के लिए सूचीबद्ध किया गया था. अडानी मुद्दे पर विपक्षी सदस्यों के हंगामे के बाद सदन को दिन भर के लिए स्थगित कर दिए जाने के कारण विधेयक पर चर्चा नहीं हो सकी थी.

कांग्रेस सांसद नसीर हुसैन ने बिल पेश करने पर आपत्ति जताते हुए राज्यसभा सचिवालय को नोटिस दिया था. अपने नोटिस में हुसैन ने कहा कि उन्हें इस विधेयक पर आपत्ति है क्योंकि "यह हमारे समाज के सामाजिक ताने-बाने, साझा जीवन और सदियों पुराने भाईचारे को प्रतिकूल रूप से बिगाड़ता है और सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करता है."

क्या है 1991 का पूजास्थल कानून

1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में 'प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट' यानी पूजा स्थल कानून पारित हुआ. इसे स्पेशल प्रोविजन के तहत बनाया गया था.

इस कानून के मुताबिक 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में जिस भी धर्म का जो पूजा स्थल था, उसे किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में बदला नहीं जा सकता. अगर कोई ऐसा करने का प्रयास करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है.

इस कानून में यह भी प्रावधान है कि दूसरे धर्म के कब्जे के सबूत मिलने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है. हालांकि अयोध्या में राम मंदिर के मामले को इसके दायरे से बाहर रखा गया था.

राम मंदिर मामले को इस कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए दलील दी गई कि यह मामला ब्रिटिश शासनकाल से कोर्ट में था इसलिए राम मंदिर पर कोर्ट के फैसले में यह कानून आड़े आ नहीं सकता.

अयोध्या विवाद पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद टिप्पणी की थी कि पुराने विवादों को उठाने और नए संघर्षों को जन्म देने के लिए इतिहास की परतों को खोलना ठीक नहीं है. लेकिन इसके बावजूद ज्ञानवापी और मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद का मामला कोर्ट जा पहुंचा है.

यह कानून 1990 के दशक में तब लाया गया, जब देश भर में राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था. अयोध्या के अलावा वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद पर भी हिंदू पक्ष अपना दावा जता रहे थे.

क्योंकि अयोध्या का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पहले से ही कोर्ट में था इसलिए 1991 के कानून में इसे छूट दे दी गई और बाकी जगहों पर सांप्रदायिक सद्भाव खराब न हो, इसलिए यह कानून बना दिया गया. इस कानून में 15 अगस्त, 1947 की डेट कटऑफ के तौर पर तय कर दी गई.

(The above story first appeared on LatestLY on Feb 06, 2024 04:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).