बेंगलुरु: सोशल मीडिया (Social Media) पर इन दिनों बेंगलुरु (Bengaluru) की एक महिला वकील का वीडियो तेजी से वायरल (Viral Video) हो रहा है, जिसने आम जनता के बीच पैसों के लेन-देन और अदालती कार्यवाही को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. एडवोकेट जोशिबा देव (Joshiba Dev) ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा कर बताया कि उनके एक करीबी दोस्त ने उनके ₹5 लाख रुपये उधार लिए थे, लेकिन मांगने पर उसने पैसे लौटाने से साफ इनकार कर दिया. खुद कानून की जानकार होने के बावजूद जोशिबा ने अपने दोस्त के खिलाफ कोई भी कानूनी मुकदमा या दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दर्ज न करने का फैसला किया है. उन्होंने कोर्ट की लंबी प्रक्रियाओं और डूबे हुए पैसे की वसूली की अनिश्चितता को इसकी मुख्य वजह बताया है. यह भी पढ़ें: Sonbhadra Accident: सोनभद्र में अजीबोगरीब हादसा; गली के वेंडर से आइसक्रीम लपकने के चक्कर में पहली मंजिल की छत से गिरा शख्स, हैरान करने वाला वीडियो आया सामने
'जाओ कोर्ट में केस कर दो, मैं पैसे नहीं दूंगा'
जोशिबा देव ने वीडियो में उस कड़वे अनुभव को साझा किया जब उन्होंने अपने दोस्त से अपनी ही रकम वापस मांगी थी. दोस्त ने पैसे देने के बजाय उन्हें सीधे कोर्ट जाने की चुनौती दे डाली.
जोशिबा ने बताया, "मेरे एक दोस्त ने, जिस पर मेरे पांच लाख रुपये उधार थे, मेरे मुंह पर कहा कि जाओ जाकर कोर्ट में केस कर दो, मैं तुम्हारे पैसे वापस नहीं करने वाला." उन्होंने आगे कहा कि भले ही वह दोस्त किसी आर्थिक तंगी से गुजर रहा हो, लेकिन इस समय वे खुद भी वित्तीय जिम्मेदारियों और कठिन दौर से गुजर रही हैं.
जोशिबा देव का कहना है कि एक वकील होने के बावजूद, वह यह केस दायर नहीं करेंगी
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खुद वकील होकर भी कानूनी लड़ाई से क्यों पीछे हटीं?
जोशिबा ने अदालती लड़ाई न लड़ने के अपने फैसले के पीछे न्याय प्रणाली की व्यावहारिक सच्चाइयों और कमियों का हवाला दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत से अपने पक्ष में डिक्री (फैसला) मिल जाने का मतलब यह नहीं होता कि आपके बैंक खाते में तुरंत पैसे आ जाएंगे, खासकर तब जब सामने वाला कर्जदार दिवालिया हो चुका हो.
जोशिबा के अनुसार, पैसों की वसूली का एक सामान्य सिविल सूट (Recovery Suit) कम से कम तीन साल तक खिंच सकता है. उन्होंने कहा, "मान लीजिए कि तीसरे साल के अंत में फैसला मेरे पक्ष में आ भी जाता है, लेकिन तब भी अगर उस व्यक्ति की वित्तीय स्थिति नहीं सुधरी या वह खुद को दिवालिया (Insolvent) घोषित कर देता है, तो मुझे क्या मिलेगा?"
सबूत जुटाने का भारी बोझ और अदालतों में लंबित मामले
जोशिबा ने एक और महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु की ओर इशारा करते हुए कहा कि दीवानी मामलों में सबूत पेश करने का पूरा जिम्मा शिकायतकर्ता (लेंडर) पर ही होता है. कोर्ट में यह साबित करने के लिए कि देनदार के पास पैसे हैं, मुझे उसकी छिपी हुई संपत्तियों, निवेशों या उसकी जीवनशैली का डेटा जुटाना होगा. एक आम व्यक्ति के लिए यह जानकारी निकालना बेहद थकाऊ और मुश्किल काम है.
उन्होंने देश की न्याय प्रणाली पर टिप्पणी करते हुए वीडियो के कैप्शन में लिखा, "भारतीय अदालतों में वर्तमान में 4.9 करोड़ (49 मिलियन) से अधिक मामले लंबित हैं. इतनी छोटी रकम के लिए इस लंबी व्यवस्था में लड़ना समझदारी नहीं है. अगर यह रकम ₹10 लाख से अधिक होती, तो शायद मुकदमा करना तार्किक होता क्योंकि लंबी लड़ाई के बाद कम से कम ₹5 लाख तो वसूल हो पाते, लेकिन ₹5 लाख के लिए इतनी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलना सही नहीं है."
जोशिबा ने अंत में कहा कि वे अब इस कड़वे अनुभव को एक व्यक्तिगत सबक की तरह देख रही हैं और भविष्य में किसी भी मित्र को केवल उतनी ही राशि उधार देंगी, जिसे पूरी तरह डूब जाने पर भी वे सह सकें.













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