दुनिया की सबसे असरदार पर्यावरण नीति 'ईटीएस' पर कमजोर पड़ने का खतरा
यूरोपीय आयोग ने यूरोप के 'एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम' (ईटीएस) को पहले से कमजोर करने का प्रस्ताव रखा है.
यूरोपीय आयोग ने यूरोप के 'एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम' (ईटीएस) को पहले से कमजोर करने का प्रस्ताव रखा है. कार्बन की कीमत तय करने और कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन घटाने की यह व्यवस्था दुनिया के लिए एक मॉडल मानी जाती है.यूरोप का कार्बन मार्केट शायद ही कभी सुर्खियों में आता है, लेकिन आज यह दुनिया की सबसे असरदार पर्यावरण नीतियों में से एक बन चुका है. यूरोपीय संघ साल 2050 तक कार्बन-न्यूट्रल (शून्य कार्बन उत्सर्जन वाला समूह) बनना चाहता है और उसका कार्बन मार्केट इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने का सबसे मुख्य हथियार है.
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2040 का अंतरिम लक्ष्य बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए ईयू का कार्बन मार्केट उसका सबसे प्रमुख साधन है. यूरोपीय आयोग ने शुक्रवार को यूरोपीय उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (यूरोपियन एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम- ईटीएस) के अगले संशोधन के लिए एक संशोधन प्रस्तावित किया है. प्रस्ताव के अनुसार, यूरोपीय उद्योगों के कुछ हिस्सों को 2038 तक जलवायु को नुकसान पहुंचाने वाली ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रखने की अनुमति दी जाएगी, और उन्हें इन उत्सर्जनों के लिए भुगतान भी नहीं करना होगा. यह अवधि पहले निर्धारित समय-सीमा से चार वर्ष अधिक है. यह छूट इस्पात (स्टील) और सीमेंट निर्माण जैसे क्षेत्रों पर लागू होगी.
संशोधित नियमों के तहत, यूरोपीय संघ उन कंपनियों को 80 फीसदी निःशुल्क उत्सर्जन परमिट अग्रिम रूप से देगा, जिन्होंने अपने संचालन को कम-कार्बन बनाने (डीकार्बोनाइजेशन) में निवेश करने की योजना प्रस्तुत की है. बाकी के 20 फीसदी परमिट तभी दिए जाएंगे, जब कंपनियां इन निवेश योजनाओं को वास्तव में लागू कर देंगी. यूरोपीय संघ के सदस्य देश और यूरोपीय सांसद अगले एक वर्ष के दौरान इस संशोधन पर बातचीत करेंगे और इसके अंतिम स्वरूप पर निर्णय लेंगे.
उद्योग जगत के कई बड़े खिलाड़ी एक और ज्यादा मजबूत सिस्टम की उम्मीद कर रहे हैं. इनमें यूरोप के स्टील सेक्टर के वे हिस्से भी शामिल हैं जिन्होंने पहले ही पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन में निवेश कर दिया है. लेकिन असल में यह उत्सर्जन व्यापार (एमिशन ट्रेडिंग) क्या है और यह कितनी अच्छी तरह काम करता है?
एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम 'ईटीएस' क्या है?
एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम (ईटीएस) प्रदूषण की कीमत तय करता है. इस स्कीम के तहत, कंपनियों को उन ग्रीनहाउस गैसों के लिए परमिट लेना जरूरी होता है जिनका वे उत्सर्जन करती हैं.
यूरोप के इस सिस्टम में हवाई यात्रा (एविएशन), तेल रिफाइनरियां, कोयले से चलने वाले बिजली घर, स्टील और सीमेंट के कारखाने, कांच और कागज का उत्पादन, साथ ही केमिकल इंडस्ट्री के कुछ हिस्से और शिपिंग शामिल हैं. ये सभी सेक्टर मिलकर यूरोपीय संघ के कुल उत्सर्जन के 40 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं. इस नियम के दायरे में लगभग 10,000 औद्योगिक इकाइयां, फैक्ट्रियां और बिजली संयंत्र आते हैं.
इसका आइडिया बहुत सीधा है: कोई कंपनी जितना ज्यादा प्रदूषण फैलाएगी, उसे उतना ही ज्यादा भुगतान करना होगा. यूरोपीय संघ उत्सर्जन की कुल सीमा तय कर देता है और सीमित संख्या में अलाउंस (परमिट) जारी करता है. हर एक परमिट के तहत, कंपनी को निश्चित मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें छोड़ने की इजाजत मिलती है. इन परमिट को कार्बन मार्केट में शेयर की तरह खरीदा-बेचा जा सकता है.
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इससे कार्बन की कीमत तय हो जाती है, जिसका मकसद कंपनियों को जल्द से जल्द अपना उत्सर्जन घटाने के लिए प्रोत्साहित करना है. इस यूरोपीय सिस्टम से जो भी कमाई होती है, उसका इस्तेमाल ज्यादा स्वच्छ और ग्रीन इकोनॉमी (पर्यावरण के अनुकूल अर्थव्यवस्था) की तरफ बढ़ने के लिए किया जाता है. जलवायु से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, हर साल उत्सर्जन की इस अधिकतम सीमा को घटाया जाता है. मौजूदा नियमों के मुताबिक, इसमें हर साल 4.3 फीसदी की कटौती की जाती है.
यह सिस्टम कहां काम करता है और कहां कमजोर पड़ जाता है?
यूरोपीय संघ की पर्यावरण संस्था ‘यूरोपियन एनवायरनमेंट एजेंसी' के मुताबिक, इस सिस्टम के सबसे बेहतरीन नतीजे बिजली और ऊर्जा क्षेत्र में देखने को मिले हैं. इस योजना के दायरे में आने वाली सभी फैक्ट्रियों और औद्योगिक ठिकानों से होने वाला उत्सर्जन साल 2005 से 2024 के बीच 51 फीसदी तक कम हो गया है. यहां तक कि सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली स्टील इंडस्ट्री भी अब इस स्कीम के शुरू होने से, पहले की तुलना में लगभग 20 फीसदी कम कार्बन का उत्सर्जन कर रही है.
हालांकि, एविएशन सेक्टर की कहानी कुछ अलग ही है. गैर-सरकारी संगठन ‘कार्बन मार्केट वॉच' के मुताबिक, इस सेक्टर में उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि यह ईटीएस सिस्टम विमानन क्षेत्र से पर्यावरण को पहुंचने वाले कुल नुकसान के सिर्फ बहुत छोटे हिस्से को ही कवर करता है. इस सिस्टम का जो सबसे बड़ा और असरदार हथियार है, वही इसकी सबसे मुख्य कमजोरी भी है: वह है उत्सर्जन के परमिट मुफ्त में बांटना यानी फ्री अलाउंस.
इन्हें एक अस्थायी कदम के रूप में शुरू किया गया था, ताकि बदलाव के इस दौर में उद्योगों को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके. लेकिन ईटीएस सिस्टम शुरू होने के दो दशक बाद भी ये मुफ्त परमिट बड़े पैमाने पर बांटे जा रहे हैं. ‘कार्बन मार्केट वॉच' के मुताबिक, उद्योगों से होने वाले कुल उत्सर्जन का करीब 90 फीसदी हिस्सा आज भी इन मुफ्त परमिटों (फ्री अलाउंस) के दायरे में आता है. इसका सीधा मतलब यह है कि उद्योगों को अपने कुल सीओ2 उत्सर्जन के सिर्फ बहुत छोटे हिस्से के लिए ही पूरी कीमत चुकानी पड़ती है.
मौजूदा योजना इन मुफ्त परमिटों को धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म करने की है, लेकिन उद्योगों के संगठन इस कदम का कड़ा विरोध कर रहे हैं. कार्बन मार्केट वॉच में ईयू पॉलिसी हेड विजनैंड स्टोफ्स ने कहा, "अगर सीधे शब्दों में कहें, तो बड़ी तेल और पेट्रोकेमिकल कंपनियां इसके खिलाफ सबसे ज्यादा लॉबिंग कर रही हैं. उनका साथ कुछ ऐसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी दे रहे हैं, जो मुख्य रूप से कोयले पर निर्भर हैं.” स्टोफ्स का कहना है कि कुछ कंपनियों को जरूरत से ज्यादा अलाउंस मिलते हैं और वे बाकी बचे हुए अलाउंस बेच देती हैं, जिससे उन्हें मुनाफा होता है.
ईयू का कार्बन मार्केट: क्या इस ग्लोबल ब्लूप्रिंट में काफी कमियां हैं?
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, दुनिया भर में अब 35 से ज्यादा एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम काम कर रहे हैं. स्टोफ्स का कहना है कि इसकी एक वजह यह है कि यूरोपीय संघ ने इस दिशा में सबसे पहले कदम उठाए थे और उसका सिस्टम दूसरे देशों के लिए एक ब्लूप्रिंट बन गया. एक और चीज है, यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (सीबीएएम), जो बाहर से आने वाले कुछ खास सामानों पर कार्बन टैक्स लगाता है. इसका मकसद यह पक्का करना है कि जिन देशों में पर्यावरण के नियम ढीले हैं, वहां से आने वाला सामान यूरोप के सख्त नियमों के तहत बने सामानों के मुकाबले बाजार में अनुचित फायदा न उठा सके.
स्टोफ्स ने कहा, "सीबीएएम की शुरुआत की वजह से दुनिया भर में एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम को अपनाने में काफी तेजी आई है. इंडोनेशिया, फिलीपींस, भारत और तुर्की, ये सभी देश या तो पहले ही ऐसा सिस्टम बना चुके हैं या बहुत ही तेजी से इस पर काम कर रहे हैं. वे इसे ‘ब्रसेल्स इफेक्ट' के रूप में देखते हैं. इसका मतलब है, यूरोपीय संघ के कानूनों की वह ताकत, जिससे वे यूरोप की सीमाओं से बहुत दूर तक के नियमों और नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं. उन्होंने आगे कहा, "हम कार्बन की कीमत तय करते हैं. दूसरे देश भी ऐसा ही कर रहे हैं और हमें इसी की जरूरत है. अगर हर कोई कार्बन की कीमत तय करता है, तो किसी को भी प्रतिस्पर्धा में नुकसान नहीं होगा. बल्कि, हमारे पास जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्या को हल करने का मौका होगा.”
दूसरे देश भी यूरोप की कुछ गलतियों को दोहरा सकते हैं. स्टोफ्स तुर्की और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हैं. यूरोपीय सिस्टम के शुरुआती सालों की तरह वहां की कंपनियां विदेशों में प्रोजेक्ट के जरिए अपने उत्सर्जन के कुछ हिस्सों की भरपाई कर सकती हैं या कर सकती थीं. ऑफसेटिंग से कंपनियों को उत्सर्जन जारी रखने की सुविधा मिलती है और इसके बदले में कहीं और चल रहे प्रोजेक्ट, जैसे पेड़ लगाने की योजनाओं को पैसा दे सकती हैं. लेकिन पर्यावरण संगठनों का तर्क है कि यह तरीका अक्सर पारदर्शी नहीं होता और इससे हमेशा उत्सर्जन में वास्तविक तौर पर कमी नहीं आती है.
विश्व बैंक का एक विश्लेषण भी इस बारे में बड़ा सबक देता है. इसमें पाया गया कि न्यूजीलैंड के ‘एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम' से वहां कार्बन डाइऑक्साइड से होने वाले प्रदूषण पर कोई खास असर नहीं पड़ा. इसकी एक सबसे बड़ी वजह यह थी कि कृषि क्षेत्र, जो न्यूजीलैंड के कुल राष्ट्रीय प्रदूषण के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार है, उसे इस पूरे सिस्टम से बाहर रखा गया था.
ब्रसेल्स में लड़ाई
यूरोप के कार्बन मार्केट का अगला दौर कैसा होगा, इसकी लड़ाई अभी ब्रसेल्स में चल रही है. हाल ही में लिखे एक पत्र में, स्वीडन की ईयू मामलों की मंत्री जेसिका रोजेनक्रांत्स ने कहा, "इंडस्ट्रियल ट्रांजिशन (उद्योगों के पर्यावरण के अनुकूल बदलाव) के लिए निवेश को बढ़ावा देने के मकसद से, लीनियर रिडक्शन फैक्टर यानी प्रदूषण की तय सीमा में हर साल की जाने वाली कटौती को काफी ऊंचे स्तर पर बनाए रखना सबसे जरूरी बात है.” उन्होंने यह भी मांग की कि कचरा जलाने से होने वाले उत्सर्जन को भी कार्बन प्राइसिंग के दायरे में लाया जाए.
इसके उलट, कुछ व्यावसायिक घराने इसका बिल्कुल उल्टा चाहते हैं. वे दबाव बना रहे हैं कि इस योजना के मुख्य हिस्सों को या तो टाल दिया जाए या फिर कमजोर कर दिया जाए. उनकी मांगों में मुफ्त परमिट (फ्री अलाउंस) को खत्म करने की रफ्तार को धीमा करना और 2040 के लिए यूरोपीय संघ की जलवायु रणनीति को थोड़ा नरम बनाना शामिल है. लॉबी ग्रुप ‘बिजनेसयूरोप' का तर्क है कि महंगाई, भू-राजनीतिक टकराव, वैश्विक व्यापार पर लगी पाबंदियां, सेना और रक्षा पर होने वाला भारी खर्च और यूरोप की कमजोर अर्थव्यवस्था पहले से ही उद्योगों को भारी दबाव में डाल रही है. उनका कहना है कि ऐसे में कार्बन की कीमतों में और बढ़ोतरी होने से उन सेक्टर पर बोझ बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा जो पहले से ही महंगाई और इन भू-राजनीतिक विवादों की मार झेल रहे हैं.
यूरोपीय संसद के सबसे बड़े राजनीतिक गुट, कंजर्वेटिव ईवीपी के पर्यावरण नीति प्रवक्ता का तर्क है कि मुफ्त अलाउंस बंद करने की समय-सीमा को साल 2039 के बाद तक आगे बढ़ा दिया जाना चाहिए. हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि कंपनियों को ये मुफ्त परमिट केवल कुछ खास शर्तों के पूरा होने पर ही मिलने चाहिए. प्रवक्ता ने कहा, "कंपनियां अपने फ्री अलाउंस का फायदा उठाकर यूरोप से बाहर निवेश करें, यह अब बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सबसे सही तरीका यह होगा कि इन्हें उसी खास जगह पर निवेश करने की शर्त से जोड़ दिया जाए जहां वे काम कर रही हैं. इस तरह, हम नौकरियां भी सुरक्षित रख पाएंगे और साथ ही एक औद्योगिक केंद्र के रूप में यूरोप को ज्यादा मजबूत बना सकेंगे.”
इस राजनीतिक लड़ाई के नतीजे पहले ही सामने आ चुके हैं. इमारतों और सड़क परिवहन में इस्तेमाल होने वाले ईंधन के लिए यूरोप का दूसरा ‘एमिशन ट्रेडिंग सिस्टम' असल में 2027 में शुरू होना था. राजनीतिक दबाव के कारण इसे 2028 तक टाल दिया गया. जर्मन एनवायरनमेंट एजेंसी (यूबीए) ने और देरी या नियमों को कमजोर करने के खिलाफ चेतावनी दी है. एजेंसी का कहना है कि अगर ईयू को अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना है, तो फ्री अलाउंस को सीमित करना और एक मजबूत कार्बन बाजार बनाए रखना बहुत जरूरी है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 17, 2026 07:00 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

