उत्तराखंड: हल्द्वानी में मस्जिद ढहाने पर भड़की हिंसा में गई चार की जान
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक मस्जिद और मदरसे को ढहाने के प्रशासनिक कदम से स्थानीय लोग इतने नाराज हो गए कि वहां जानलेवा हिंसा भड़क उठी. हिंसा के बीच चार लोगों के मारे जाने और कई लोगों के घायल होने की खबर है.मामला उत्तराखंड के हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके का है. प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि स्थानीय अदालत के आदेश पर प्रशासन की एक टीम उस इलाके में "अवैध अतिक्रमण" हटाने के लिए गई थी.

नैनीताल की जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) ने मीडिया को बताया कि जिस इमारत को ढहाया जाना था वो एक खाली इमारत थी जिसमें दो ढांचे हैं जिन्हें "कुछ लोग मदरसा कहते हैं और कुछ लोग नमाज स्थल" कहते हैं.

कैसे भड़की हिंसा

लेकिन डीएम के मुताबिक यह ढांचे ना तो "कहीं पर भी किसी धार्मिक संरचना के रूप में रजिस्टर्ड हैं ना ही किसी प्रकार से मान्यता प्राप्त हैं." प्रशासन ने वहां 30 जनवरी को एक नोटिस चस्पा किया और इन ढांचों को "अतिक्रमण" बताते हुए इन्हें तीन दिन में हटाने का आदेश दिया.

नोटिस में यह भी लिखा था कि तीन दिनों के बाद प्रशासन खुद इन्हें हटा देगा. इसी कार्रवाई के तहत प्रशासन की टीम वहां गई थी लेकिन अधिकारियों का कहना है कि वहां मौजूद लोगों ने नगर निगम और पुलिस के अधिकारियों पर पथराव किया.

पुलिस ने जवाब में भीड़ पर आंसू गैस के गोले छोड़े. डीएम के मुताबिक इसके बाद अधिकारियों पर पेट्रोल बम भी फेंके गए. इसके बाद इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया और पुलिस को दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश भी दे दिए गए.

मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि इस हिंसा में अभी तक कम से कम चार लोगों की जान जा चुकी है. मृतकों के बारे में विस्तार से कोई जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है. 100 से भी ज्यादा लोगों और अधिकारियों के घायल होने की भी खबर है.

क्या अदालत से मिली थी इजाजत?

स्थानीय लोगों ने इस बात से इंकार किया है कि अदालत ने इन ढांचों को हटाने का आदेश दिया था. इलाके के नगर निगम पार्षद शकील अहमद ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार को बताया कि मामला हाई कोर्ट में चल रहा है और अभी इसमें अंतिम फैसला नहीं आया है.

अहमद का कहना है कि 14 फरवरी को हाई कोर्ट में अगली सुनवाई होनी है और और ऐसे में जब अधिकारी वहां पहुंचे तो लोगों ने उनसे अनुरोध किया कि अदालत का फैसला आने तक रुक जाएं.

अहमद ने यह भी कहा कि उन्होंने और लोगों ने अधिकारियों से कहा था कि अगर अदालत ढांचों को तोड़ने के फैसला देती है तो वो प्रशासन को नहीं रोकेंगे, लेकिन अधिकारियों ने उनकी नहीं सुनी. फिलहाल पूरे हल्द्वानी में कर्फ्यू लगा दिया गया है.

पिछले साल से सुलग रहा है हल्द्वानी

हल्द्वानी का बनभूलपुरा इलाका पिछले साल भी सुर्खियों में आया था जब रेलवे लाइन के पास रह रहे 4,000 परिवारों को प्रशासन द्वारा जमीन खाली करने का नोटिस दिया गया था. स्थानीय लोगों ने प्रशासन के आदेश के खिलाफ प्रदर्शन किया था.

मामला हाई कोर्ट पहुंचा जहां अदालत ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को सही ठहराया. उसके बाद मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अगस्त, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 50,000 लोगों को रातोंरात हटाया नहीं जा सकता है और कोई और तरीका निकालना पड़ेगा.

इस बीच अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में "बुलडोजर कार्रवाई" को लेकर दो रिपोर्टें जारी की है. एमनेस्टी ने भारत में मुसलमानों के घरों, दुकानों और इबादत स्थलों को बड़े पैमाने पर "गैर-कानूनी तरीके से ढहाना" बंद किए जाने की मांग की है.

"बुलडोजर कार्रवाई" रोकने की मांग

एमनेस्टी ने 7 फरवरी को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा कि चार भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों और एक आम आदमी पार्टी शासित राज्य में अधिकारियों ने अप्रैल और जून 2022 के बीच 128 संपत्तियों को "दंडात्मक रूप" से बुलडोजर से गिरा दिया, जो ज्यादातर मुसलमानों से संबंधित थीं.

इन दोनों रिपोर्ट का शीर्षक है "अगर तुम आवाज उठाओगे तो तुम्हारा घर तोड़ दिया जाएगा, भारत में अन्याय का बुलडोजर और "अनअर्थिंग अकाउंटेबिलिटी: भारत में बुलडोजर अन्याय में जेसीबी की भूमिका और जिम्मेदारी."

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत सरकार और राज्य सरकारों से आह्वान किया है कि वे न्यायेतर दंड के रूप में लोगों के घरों को ध्वस्त करने की "डी फैक्टो" नीति को तुरंत रोकें और यह सुनिश्चित करें कि जबरन बेदखली के जरिए किसी को बेघर न किया जाए.

उसने सरकार से मांग है कि उन्हें विध्वंस से प्रभावित सभी लोगों को पर्याप्त मुआवजा भी देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो.

बुलडोजर के निशाने पर मुसलमान?

रिपोर्ट में 128 घटनाओं का विवरण दिया गया है, जिनमें जेसीबी मशीनों के बार-बार इस्तेमाल के कम से कम 33 उदाहरण शामिल हैं, इन कार्रवाई में 617 व्यक्ति प्रभावित हुए जो बेघर हो गए या अपनी आजीविका से वंचित हो गए.

रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 56 "दंडात्मक विध्वंस" दर्ज किए गए, इसके बाद गुजरात में 36 और आम आदमी पार्टी शासित दिल्ली में 25 तोड़फोड़ दर्ज किए गए. इस अवधि के दौरान असम में आठ संपत्तियां और उत्तर प्रदेश में तीन संपत्तियां ढहा दी गईं.

एमनेस्टी की जांच में यह भी पता चला कि पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों समेत कम से कम 617 लोग बेघर हो गए या अपनी आजीविका से वंचित हो गए.

इन व्यक्तियों को पुलिस द्वारा जबरन बेदखली, धमकी और गैर-कानूनी बल और सामूहिक और मनमानी सजा का सामना करना पड़ा, जिसने गैर-भेदभाव, पर्याप्त आवास और निष्पक्ष सुनवाई के उनके अधिकारों को कमजोर कर दिया.

एमनेस्टी ने इस बात पर भी जोर दिया कि मुस्लिम बहुल इलाकों को निशाना बनाया गया, जबकि मुसलमानों की संपत्तियों को चुनिंदा रूप से तोड़ दिया गया, जिससे आस-पास के हिंदू-स्वामित्व वाली संपत्तियां अछूती रह गईं.

बीजेपी और आम आदमी पार्टी ने अभी तक इस रिपोर्ट पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.