ट्रंप के टैरिफ से भारत को ₹1.27 लाख करोड़ का झटका! अब क्या रणनीति अपनाएगी मोदी सरकार?

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित रिकॉर्ड-उच्च "रिसिप्रोकल टैरिफ़" भारत के लिए ₹1.27 लाख करोड़ के निर्यात घाटे का खतरा पैदा कर रहे हैं. इससे ऑटो पार्ट्स, आईटी और टेक्सटाइल सेक्टर पर बड़ा असर पड़ेगा. भारत को अब फुर्ती से नई व्यापार रणनीति बनानी होगी ताकि अमेरिकी संरक्षणवाद का मुकाबला किया जा सके.

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 2 अप्रैल को घोषित “लिबरेशन डे” टैरिफ ने वैश्विक व्यापार जगत में भूचाल ला दिया है. इन टैरिफों का प्रभाव 90 देशों पर पड़ेगा, लेकिन भारत जैसे व्यापारिक साझेदारों के लिए यह झटका और भी गहरा हो सकता है. ट्रंप के “America First Trade Policy” के तहत घोषित इन रेसिप्रोकल टैरिफों का सीधा असर भारत के अमेरिका को किए जाने वाले $78 बिलियन (लगभग ₹6.5 लाख करोड़) के निर्यात पर पड़ेगा, जिससे ₹1.27 लाख करोड़ तक के नुकसान की आशंका जताई जा रही है.

भारत के लिए बढ़ा खतरा: 27% का भारी टैरिफ

भारत को ट्रंप ने पहले ही “Tariff King” की संज्ञा दी थी, और इस बार उस पर 27% का भारी टैरिफ लगाया गया है. यह दर जापान (24%) और दक्षिण कोरिया (25%) से भी अधिक है, हालांकि चीन पर 34% का अधिकतम टैरिफ लगाया गया है. इस निर्णय के चलते भारत की करीब 18% निर्यात निर्भरता अमेरिका पर होने के कारण यह झटका अधिक खतरनाक हो गया है. टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, स्टील और आईटी सेवाएं जैसे क्षेत्रों में यह प्रभाव विशेष रूप से तीव्र होगा.

हालांकि एक राहत की बात यह है कि ट्रंप ने भारतीय दवाओं को इस टैरिफ से बाहर रखा है. वर्ष 2023-24 में भारत ने अमेरिका को $8.73 बिलियन मूल्य की दवाइयां निर्यात की थीं, जिससे भारत अमेरिका का सबसे बड़ा फार्मा सप्लायर बना है.

कॉरपोरेट जगत पर सीधा असर

ITC, Raymond, Tata Motors, Welspun, Sona BLW, Himatsingka Seide, Trident, SRF, Apex Frozen Foods, Ramkrishna Forgings जैसी कंपनियां, जिनकी निर्भरता अमेरिकी बाजार पर अधिक है, अब जबरदस्त दबाव में आ गई हैं. इससे शेयर बाजार में अस्थिरता देखी जा रही है, और गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों में नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है.

विकट स्थिति में छिपा अवसर

जहां यह फैसला भारत के लिए बड़ा आर्थिक झटका है, वहीं इसमें आत्मनिर्भरता और विविधीकरण की संभावना भी छिपी है. अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता के चलते यह समय है कि भारत अपने निर्यात बाजारों को यूरोपीय संघ, ASEAN, खाड़ी देशों की ओर मोड़े. इससे व्यापार संतुलन में सुधार होगा और ट्रंप की नीति के खिलाफ कूटनीतिक जवाब भी मिलेगा.

एफटीए और पीएलआई से मिल सकती है राहत

भारत पहले से ही UK, EU और ऑस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर बातचीत कर रहा है. ट्रंप की टैरिफ नीति इन समझौतों को तेजी से अंतिम रूप देने का अवसर बन सकती है. साथ ही, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में घरेलू निर्माण को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन का विकल्प बन सके.

आर्थिक-सामरिक रणनीति की जरूरत

भारत को तत्काल एक बहुस्तरीय रणनीति बनानी चाहिए:

भविष्य के व्यापार संबंधों की अनिश्चितता

ट्रंप की टैरिफ नीति ने लंबे समय से प्रतीक्षित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की संभावनाओं पर भी पानी फेर दिया है. हालांकि पीएम मोदी और ट्रंप के बीच व्यक्तिगत संबंध अच्छे माने जाते हैं, लेकिन इस नीति के चलते द्विपक्षीय संबंधों में दरार आ सकती है. भारत अब एशिया, यूरोप और खाड़ी देशों के साथ गहरे व्यापारिक संबंध बनाकर अमेरिका पर निर्भरता कम करने की ओर बढ़ सकता है.

इतिहास से सबक और वैश्विक राजनीति में बदलाव

ट्रंप के पिछले कार्यकाल में लगाए गए टैरिफों ने अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए महंगाई बढ़ा दी थी. किसानों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा था और सरकार को सब्सिडी देनी पड़ी थी. इतिहास गवाह है कि टैरिफ युद्ध लंबे समय तक टिकते नहीं हैं और आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं. विशेषज्ञों को डर है कि ट्रंप की नई नीति अमेरिका को मंदी की ओर धकेल सकती है.

भारत की राह: व्यापारिक लचीलापन और रणनीतिक स्वावलंबन

इस चुनौती के बीच भारत को चाहिए कि वह वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपना व्यापारिक परिदृश्य मजबूत करे. यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी के लिए आगे आ सकते हैं. चीन भी इस स्थिति में अमेरिका के खिलाफ रणनीतिक गठबंधन की संभावना टटोल सकता है.

डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति ने भारत के लिए चेतावनी की घंटी बजा दी है. यह समय है जब भारत को प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और दूरदर्शी सोच के साथ अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करनी होगी. अगर भारत समय रहते सही कदम उठाए, तो यह संकट एक अवसर में भी बदल सकता है—जहां से भारत अपनी आत्मनिर्भरता और वैश्विक व्यापारिक नेतृत्व की दिशा में एक नई शुरुआत कर सकता है.

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